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अपरिहार्य गांधी

मिथलेश शरण चौबे सबके अपने-अपने गांधी हैं। विरल करने की अहमन्य चेष्टाओं के बावजूद वे निरंतर सघन होते जा रहे हैं। अगर लाखों के लिए उनका होना एक तरह से जीवन की सार्थक संभावना है तो ऐसे भी बहुत हैं, जो अपने बचे रहने के लिए अपरिहार्य मानते हुए उन्हें कोसते रहते हैं। इनके अलावा […]
Author April 22, 2015 13:53 pm

मिथलेश शरण चौबे

सबके अपने-अपने गांधी हैं। विरल करने की अहमन्य चेष्टाओं के बावजूद वे निरंतर सघन होते जा रहे हैं। अगर लाखों के लिए उनका होना एक तरह से जीवन की सार्थक संभावना है तो ऐसे भी बहुत हैं, जो अपने बचे रहने के लिए अपरिहार्य मानते हुए उन्हें कोसते रहते हैं। इनके अलावा ऐसे भी लोग हैं, जिन्हें किसी उदात्त की उपस्थिति या फिर क्रूरतापूर्वक उनकी निंदा से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब जहां स्थिति अनुकूल बनती हो, उसी करवट बैठ जाना उनका एकमात्र काम होता है। हालांकि ऐसा लगता है कि गांधी इन्हीं सबके बीच आवाजाही कर रहे हैं। उनकी व्याप्ति इतनी है कि होने न होने के परे उनकी उपस्थिति दिशा और काल की अवधि का विनम्र अतिक्रमण कर हर उस जगह है, जहां मनुष्यता की आकांक्षा जीवित है। वे इतने सरल हैं कि मैले, फटे कपड़ों में अधढके साधारण लोगों के पास हर समय उपस्थित हैं और इतने कठिन कि बार-बार उनकी तस्वीरों पर माला पहनाने और हर समय उनका नाम जप कर अपनी साख बनाने में लगे लोगों की तमाम चेष्टाओं के बाद भी वे वहां से नदारद हैं। धर्म, राजनीति, साहित्य, विचार, संस्कृति, अर्थशास्त्र, सामाजिक उत्कर्ष आदि सभी के लिए वे दशकों से अनिवार्य रहे हैं।

अब वे इतने अधिक उपयोगी हो चले हैं कि उनके बिना किसी तरह की राजनीतिक और समूची सांस्कृतिक हैसियत का होना संभव नहीं लगता। जो लोग उनके नाम पर सफाई अभियान चलाते हैं, उन्हीं के यहां सबसे ज्यादा वैचारिक गंदगी है। वे गांधी के हत्यारे का मंदिर बनाना चाहते हैं, बार-बार उसका नामोल्लेख करते हैं। उन्होंने गांधी के नेहरू लगाव की दुर्व्याख्या कर सरदार पटेल को अपना पक्ष बनाने की कोशिश की है। वे हमेशा अपने कमतर और आजादी के लिए अनुपयोगी साबित नेताओं को गांधी के ऊपर रखने की ज्यादती करते हैं। उनके पारिवारिक संगठन नित नए निंदा प्रलाप करते रहते हैं और फिर मीडिया में विपरीत खबर से बचने के लिए कोई क्षतिपूरक बयान देकर मुक्ति पा लेते हैं। स्वाधीनता संघर्ष में अपनी भूमिका का प्रश्न उन्हें तिलमिला कर गांधी निंदा के अचूक, लेकिन बेहया अस्त्र की पुनरावृत्ति की ओर ले जाता है।

गांधी के नाम पर अपने समूचे अस्तित्व को दिखाने की कोशिश करते हुए कुछ ऐसे भी हैं, जिनके यहां गांधी एक अदद जरूरी औपचारिकता हैं, जिनकी दुहाई के बिना कुछ भी नहीं हो सकता। गांधी के विचार, मूल्य, शैली, सौजन्य से दूर तक नाता नहीं रखने के बावजूद उनकी प्रतिमूर्ति के असल प्रतीक बनना ही उनकी एकमात्र इच्छा है। इन दोनों के अलावा भी बहुतों के लिए गांधी का उपयोग है। किसी मुद्दे पर जनसमर्थन हासिल करने के बड़े प्रतीक के रूप में गांधी की तस्वीर, खादी, उनकी बातें, उन्हें प्रिय गीत का सहारा लेना जरूरी-सा हो गया है। एक अनुपस्थित की इस कदर उपस्थिति कुछ लुभाती-सी है। जीवन भर खुद से, देश और मनुष्यता के दुश्मनों से मानवीयता के साथ संघर्ष करते रहे गांधी को लेकर आज भी कितना संघर्ष है। वे जिन शोषित, वंचित, पीड़ित लोगों के पास रहना चाहते हैं, उन्हें उनकी निर्विकार जरूरत है। गांधी के पास ही उनके लिए मार्मिक संवेदना और पीड़ा हरने की अनिवार्य बेचैनी है। इन लोगों से गांधी को छीन कर अपने पक्ष-प्रतिपक्ष की तरह इस्तेमाल करने में लगे लोगों को गांधी के होने का वास्तविक अर्थ ही शायद नहीं पता! गांधी जितने सघन होते जा रहे हैं उसी के समांतर जनसामान्य की समस्याएं ज्यादा जटिल और खौफनाक होती जा रही हैं। गांधी को अगर गांधी की तरह न समझ कर उपयोग की तरह बरता जाएगा, तो उनकी उपस्थिति ऐसी ही रहेगी। अन्यथा मनुष्य मात्र के उत्कर्ष का एक बेहद नैतिक विचार उनके यहां मिलता है।

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