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हौसले का हुलास

प्रफुल्ल कोलख्यान जनसत्ता 22 अक्तूबर, 2014: साल याद नहीं। शायद 1991 रहा होगा। एक बात याद है। ग्रामीण रिपोर्टिंग के लिए स्टेट्समैन अखबार की तरफ से सालाना पुरस्कार दिए जाने का रिवाज रहा है। इस अवसर पर आयोजित बहस भी कोलकाता के बुद्धिजीवियों की दिलचस्पी का हिस्सा रहा है। उस साल बहस में भाग लेने […]
Author October 22, 2014 09:42 am

प्रफुल्ल कोलख्यान

जनसत्ता 22 अक्तूबर, 2014: साल याद नहीं। शायद 1991 रहा होगा। एक बात याद है। ग्रामीण रिपोर्टिंग के लिए स्टेट्समैन अखबार की तरफ से सालाना पुरस्कार दिए जाने का रिवाज रहा है। इस अवसर पर आयोजित बहस भी कोलकाता के बुद्धिजीवियों की दिलचस्पी का हिस्सा रहा है। उस साल बहस में भाग लेने के लिए आमंत्रित थे माधव राव सिंधिया, गोविंदाचार्य और शहाबुद्दीन। उस साल ग्रामीण रिपोर्टिंग के लिए स्टेट्समैन की तरफ से पुरस्कार मिला था अदिति कपूर को। उनकी खबर भदोही के कालीन कारोबार में लगे बंधुआ बाल मजदूरों की मुक्ति के लिए किए गए एक अभियान से संबंधित थी। अपने मित्र विजय शर्मा के सौजन्य से अदिति कपूर से बात करने का अवसर मिला था। उन्होंने इस अभियान के संदर्भ में स्वामी अग्निवेश और कैलाश सत्यार्थी की चर्चा की थी। वह बातचीत तब जनसत्ता के कोलकाता संस्करण की रविवारी पत्रिका ‘सबरंग’ में छपी थी।

 

हाल ही में जब कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिला, तो स्वाभाविक रूप से उस घटना की याद आ गई। लेकिन अभी मंगल की कक्षा में पहुंचे यान को तैयार करने वाले अपने वैज्ञानिकों को जानने वाले कितने हैं! हम क्रिकेट, राजनीति, फिल्म, मीडिया और कुछ हद तक साहित्य आदि से जुड़े लोगों के अलावा और किसे कितना जानते हैं! कैलाशजी को कम ही लोग जानते हैं, यह दुखद भी है और सुखद भी। दुखद इसलिए कि हम समाजसेवा के कार्य में लगे लोगों को कितना कम जानते हैं! सुखद यह कि बहुत ज्यादा शोर मचाए बिना अपना काम करने वालों के काम को भी कभी-कभी महत्त्व मिल जाता है।

 

अमेरिका में भारत की जिन तीन महत्त्वपूर्ण बातों का उल्लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया, उनमें से एक है भारत की युवा शक्ति। जिस देश के अधिकतर बच्चे भूखे हों, उस देश के यौवन के ज्यादातर हिस्से में समाज-सार्थक हौसले के हुलास की संभावना बहुत कम होती है। ऐसे में ‘बचपन बचाओ’ जैसे अभियान का महत्त्व उस युवा को ही मालूम हो सकता है, जिसका बचपन बंधक रहा हो, जो बंधुआ बाल मजदूर होने की नियति के आसपास रहा हो। समाज कैलाश सत्यार्थी को चाहे जितना कम या ज्यादा जाने, लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि समाज बचपन को बचाते हुए उसे समाज-सार्थक युवा में बदलने का अवसर देने के महत्त्व को पहचाने। नए भारत के निर्माण का रास्ता बचपन को इस तरह से बचाने के अभियान के महत्त्व को आत्मसात करने के बीच से ही निकलता है। इस कठिन घड़ी में यह उम्मीद का एक और आकाश है, यह रास्ते के संधान की एक और संभावना है। विकास की यह नई जमीन का अर्थपूर्ण संकेत है। याद कीजिए बुधिया को। बुधिया, यानी युग-युग धावित यात्री को।

 

राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। 1987 में आजादी के चालीस साल के जश्न का माहौल था। तब एक कविता लिखी थी- ‘आज भी जब छोटे-छोटे बच्चों को मांजते हुए चाय की प्याली देखता हूं/ देश का भविष्य औंधी हुई कड़ाही की तरह लगता है।’ इसे नुक्कड़ नाटक के समय कोलकाता के साथियों के साथ पढ़ा जाता था। जो लोग उन्नत भारत की बात करते हैं, उन्हें जब ऐसे बच्चे दिखें तो थोड़ी देर के लिए ही सही, पर सहम जाना चाहिए, जिन बच्चों के बचपन को बचाने के काम में कैलाश सत्यार्थी और उनके साथी लगे हैं। कविता लिखने का यह भी एक तरीका है, शायद अधिक कारगर तरीका।

 

 

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