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प्यासे और प्याऊ

अखबार में प्रकाशित कुछ खबरें जितनी रोचक होती हैं, उससे ज्यादा यह सोचने पर विवश करती हैं कि हम कहां जा रहे हैं! कुछ दिन पहले एक खबर थी कि राज्य के एक बड़े मंत्री प्याऊ का उद्घाटन करेंगे। खबर पढ़ कर चेहरे पर बरबस मुस्कान तैर गई। समझ में नहीं आया कि इसे रोचक […]
Author April 29, 2015 09:06 am

अखबार में प्रकाशित कुछ खबरें जितनी रोचक होती हैं, उससे ज्यादा यह सोचने पर विवश करती हैं कि हम कहां जा रहे हैं! कुछ दिन पहले एक खबर थी कि राज्य के एक बड़े मंत्री प्याऊ का उद्घाटन करेंगे। खबर पढ़ कर चेहरे पर बरबस मुस्कान तैर गई। समझ में नहीं आया कि इसे रोचक खबर की श्रेणी में रखूं या विचार करने की। प्याऊ का शुरू होना हमारे लिए कोई उत्सव या जश्न नहीं है और न कोई शोशेबाजी। बल्कि प्याऊ एक परंपरा है, भारतीय संस्कृति का अंग और जीवन दर्शन है। मानव के प्रति मानव समाज की चिंता का सबब है प्याऊ। यह एक संकल्प भी है मानव समाज का, लेकिन आज के दौर में संकल्प और संस्कृति ने उत्सव का स्थान ले लिया है। यही वजह है कि खबर में मंत्रीजी द्वारा प्याऊ के उद्घाटन की सूचना दी गई थी।

जाहिर है, मंत्रीजी लाव-लश्कर के साथ उद्घाटन के लिए पहुंचेंगे। इस लाव-लश्कर पर जो खर्च होगा वह प्याऊ की स्थापना से कई गुना ज्यादा होगा। विचार करने की बात है कि कोई दस-पांच हजार की लागत में प्यास बुझाने के लिए प्याऊ की स्थापना हो जाएगी, लेकिन उद्घाटन उत्सव पर जो खर्च होगा, वह कम से कम प्याऊ की लागत से चार गुना अधिक होगा।

तो क्या किसी ने इस बात पर विचार करना जरूरी नहीं समझा कि एक प्याऊ के उद्घाटन से मंत्रीजी की तस्वीरें तो अखबारों में छप जाएंगी, उनके समर्थक या जनसंपर्क अधिकारी इस कार्य को सदी का महान कार्य भी बता देंगे, लेकिन क्या एक प्याऊ से सभी मुसाफिरों की प्यास बुझाने का कोई इंतजाम हो पाएगा? शायद नहीं। बेहतर होता कि मंत्रीजी इस प्याऊ के उद्घाटन उत्सव पर होने वाले खर्च को बचा कर शहर के दूसरे हिस्सों में भी प्याऊ की स्थापना कराने का उपक्रम करते। इससे उनका नाम और बड़ा होता। लेकिन ऐसा करने से अखबारों में फोटो कैसे छपेगा? मुसाफिरों की प्यास की फिक्र नहीं, लेकिन फोटो छपने की प्यास बड़ी है, सो जतन ऐसा किया जाए कि फीता काटते मंत्रीजी ही दिखें!

एक तरफ तो हम अपनी संस्कृति का ऐसा गुणगान करते थकते नहीं- हम-सा कोई दूजा नहीं, लेकिन दूसरी तरफ अपनी परंपरा और संस्कृति को उत्सव में बदल कर उसे बाजार की वस्तु बना देते हैं। प्याऊ हमारी भारतीय संस्कृति और समाज का अभिन्न अंग रहा है। गरमी शुरू होते ही मटके को लाल कपड़े में लपेट कर राहगीरों की प्यास बुझाने का प्रबंध करने की पुरानी परंपरा रही है। समय के साथ बदलाव आया और प्याऊ आहिस्ता-आहिस्ता नदारद होने लगे।

पानी की बोतलें और पाउच बाजार में आ गए। बदलाव का यह दौर इतना क्रूर हो गया कि दुकानदारों ने अपनी-अपनी दुकानों से पीने के पानी का सारा प्रबंध ही समाप्त कर दिया। ऐसे में प्याऊ एक कल्पना भर बन कर रह गया है। एक वह भी समय था, जब घर पर ब्याह होने या नवजात शिशु के आने की खुशी में तालाब और कुएं की खुदाई कराई जाती थी। लेकिन आज मॉल और मकान बनाने के लिए तालाब और कुएं को खत्म किया जा रहा है। आज जरूरत है कि हम सब मिल कर उस परंपरा और जीवन-शैली को समृद्ध करें, जिसमें भारतीय संस्कृति का गौरव दिखता है। हम सब संकल्प लें कि हर मोड़ पर लाल कपड़े में लिपटा हुआ स्वच्छ पानी से भरा हुआ घड़ा हमारा स्वागत करे। प्यास तो बुझे ही, मन भी यह सोच कर तरोताजा हो जाए कि हम एक संवेदनशील समाज का हिस्सा हैं।

मनोज कुमार

 

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