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विभाजन की भाषा

वीरेंद्र जैन केंद्र सरकार में मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के एक भाषण में प्रयुक्त शब्दों पर मचे हंगामे को भाजपा और उसके समर्थकों की ओर से ऐसे पेश किया गया, मानो दुनिया के इतने बड़े देश की सरकार चलाना बच्चों का खेल हो और किसी नादान बच्चे की गलती को वरिष्ठों को माफ कर देना […]
Author December 15, 2014 12:57 pm

वीरेंद्र जैन

केंद्र सरकार में मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के एक भाषण में प्रयुक्त शब्दों पर मचे हंगामे को भाजपा और उसके समर्थकों की ओर से ऐसे पेश किया गया, मानो दुनिया के इतने बड़े देश की सरकार चलाना बच्चों का खेल हो और किसी नादान बच्चे की गलती को वरिष्ठों को माफ कर देना चाहिए, क्योंकि उसने माफी मांग ली है। कहा गया कि कथित साध्वी की आर्थिक और ग्रामीण पृष्ठभूमि के कारण उनकी भाषा में वर्जित शब्द आ गए थे। ऐसे लोग भूल गए कि अपने कुतर्कों से वे गरीबों और ग्रामीणों का भी अपमान कर रहे हैं। भले ही गरीब और ग्रामीण लोग आभिजात्यों की चिकनी-चुपड़ी भाषा न बोल कर खुरदरी बोली में देशी प्रतीकों के साथ आपसी बात करते हैं, पर सार्वजनिक वक्तव्य देते समय या तो उनकी बोलती बंद हो जाती है या उनकी भाषा बहुत विनयपूर्ण हो जाती है। इसके विपरीत जब भी अभिजात और शक्तिशाली वर्ग मजदूरों, किसानों, दलितों, अल्पसंख्यकों जैसे वर्ग से बात करता है तो उसकी भाषा में शक्ति की कठोरता आ जाती है और विनम्रता खो जाती है।

विवादास्पद भाषण में निरंजन ज्योति की भाषा उनकी पार्टी की शक्ति के दंभ की भाषा थी जो अपने विपक्षियों के प्रति सत्तारूढ़ पार्टी की नफरत को संप्रेषित कर रही थी। अपने अल्पसंख्यक मुखौटे को भाजपा में चलाने वाले मुख्तार अब्बास नकवी जैसे नेताओं का विपक्षियों को दलित विरोधी बताते हुए अपनी पार्टी को दलित पक्षधर बताना तो किसी को भी हजम नहीं हुआ। इतिहास बताता है कि भाजपा हमेशा सवर्णों की पार्टी मानी गई है और उनका समर्थन भी पाती रही है। आरक्षण संबंधी बहसों में उसने हमेशा गोलमोल बातें की हैं।

सवाल है कि क्या यह एक केंद्रीय मंत्री की भाषा का सवाल भर है? ऐसा नहीं है। यह उस निरंजन ज्योति की भाषा भर नहीं है जो एक केवट परिवार में जन्मीं, बड़ी होकर धार्मिक प्रवचन की ओर मुड़ गर्इं और भगवा वेष धारण कर लिया। उनके विवादास्पद भाषण की भाषा भाजपा के अनेक मुखौटों में से एक मुखौटे की भाषा है, जो मुजफ्फरनगर का दंगा कराने वाले उसके कुछ नेताओं की थी और जिन्हें इसी भाषा के प्रभाव के लिए नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं में सम्मानित किया था।

ऐसी ही भाषा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के संवेदनशील बना दिए गए क्षेत्र में अमित शाह ने भी बोली थी। लेकिन उन्हें उनके इतिहास के बावजूद पूरी पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया। यह भाषा योगी आदित्यनाथ की भाषा भी है, जिन्हें उत्तर प्रदेश में उपचुनावों के लिए विशेष जिम्मेवारी सौंपी गई थी, ताकि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण सुनिश्चित किया जा सके। गिरिराज सिंह के चुनावों के दौरान दिए गए ऐसे ही बयानों के अलावा उनके पास से बिना किसी उचित हिसाब की दौलत पकड़े जाने के बावजूद उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया जाना किस बात का प्रोत्साहन है? इसलिए निरंजन ज्योति की भाषा किसी दलित-पिछड़ी निर्धन ग्रामीण महिला की भाषा नहीं है, बल्कि यह मोदीजी की भी भाषा है जो खुद ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ जैसी भाषा बोल चुके हैं!

निरंजन ज्योति पर चर्चा केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि विभाजन वाली भाषा के बारीक खेल पर भी चर्चा है। यह बोलचाल के सारे शब्दों में मुगलकाल से पूर्व में इस्तेमाल होने वाले शब्दों में बदलने की कोशिश करती है, जहां लाठी-डंडा ‘दंड’ हो जाता है, रोड शो ‘पथ संचलन’ हो जाता है और डीजल से चलने वाले डीसीएम टोयोटा को ‘रथ’ बना दिया जाता है। यह भाषा की बहस एक सच्ची राजनीतिक बहस भी है जो बार-बार नकारे गए सांप्रदायिकता के एजेंडे की सच्चाई को भी सामने लाती है। इसे संसद के बहुमूल्य समय को नष्ट होने वाले पुराने सत्तारूढ़ों के तर्कों से दबाया नहीं जाना चाहिए!

 

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