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चौपालः सोच पर सवाल

पछले दिनों देश में दो घटनाएं ऐसी हुर्इं जिन्होंने सरकार की विवेकशीलता पर सवालिया निशान लगा दिया है।
Author July 7, 2017 02:21 am

पिछले दिनों देश में दो घटनाएं ऐसी हुर्इं जिन्होंने सरकार की विवेकशीलता पर सवालिया निशान लगा दिया है। पहली घटना राजस्थान के दौसा जिले की है जहां गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों के घरों के बाहर सरकार ने लिखवाया है ‘मैं गरीब परिवार से हूं और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत राशन लेता हूं।’ इससे सीधे तौर पर गरीबों और गरीबी का मखौल उड़ाया गया है। बीपीएल कार्ड धारकों को मिलने वाला राशन उनका कानूनी अधिकार है। बाकायदा संसद में कानून बना कर संविधान में उन्हें गरिमापूर्वक यह अधिकार देने की बात कही गई है। लेकिन इसके बावजूद राज्य सरकार द्वारा गरीब की गरिमा का खयाल न रख कर किया गया इस तरह का अविवेकपूर्ण कृत्य स्पष्ट करता है कि हमारा शासन गरीबी उन्मूलन और गरीबों के प्रति कितना संजीदा है!

दूसरी घटना हरियाणा की है जहां राज्य सरकार की कार्ययोजना को लेकर निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘कृषि संवाद’ के मुखपृष्ठ पर घूंघट निकाले और सिर पर चारा उठाये महिला का फोटो प्रकाशित कर उसके कैप्शन में लिखा गया- ‘घूंघट की आन-बान, म्हारे हरियाणा की पहचान।’ शायद खट्टर सरकार को इसका आभास ही नहीं कि घूंघट निकाल कर सिर पर बोझा उठा कर चलना महिलाओं के लिए कितना कठिन होता है। घूंघट जैसी कुप्रथा महिलाओं को काफी पीछे धकेलती है जिसके उन्मूलन को लेकर जागृति लाने के बजाय उसे बढ़ावा देना महिलाओं के प्रति राज्य सरकार की दकियानूसी सोच को उजागर करता है। हालांकि इस बात में भी सच्चाई है कि घूंघट जैसी प्रथा सदियों से समाज में व्याप्त है लेकिन इसे राज्य सरकार द्वारा प्रोत्साहन देना उचित नहीं कहा जा सकता।

यह समझ से परे है कि एक ओर वर्तमान केंद्र सरकार बेटी बचाने के लिए ‘सेल्फी विद डॉटर’ जैसे अभियान चलाती है। ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरुआत हरियाणा के पानीपत से होती है, जहां की बेटियों के लिए कहा जाता, ‘म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के?’लेकिन दूसरी ओर घूंघट को संस्कृति का संवाहक बता कर बेटियों से आजादी का आकाश छीनना कहां तक न्यायपूर्ण है?
’देवेंद्रराज सुथार, जेनवीयू, जोधपुर

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