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हिंसा के सहारे

शांतिपूर्ण आंदोलनों और जन आकांक्षाओं के प्रति सत्ता प्रतिष्ठानों की उपेक्षा, भेदभाव, अवहेलनापूर्ण दृष्टि, संवादहीनता और उससे उपजी कुंठा, निराशा व मोहभंग प्रमुख कारक हैं।
Author नई दिल्ली | April 20, 2016 01:23 am
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

आजादी के आंदोलन में शांतिपूर्ण सत्याग्रह और क्रांतिकारी गतिविधियों की दो धाराएं सक्रिय रही हैं। आजादी के बाद लोकतांत्रिक प्रणाली अपनाए जाने पर हिंसात्मक आंदोलन की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी पर देश के स्वतंत्र होने के लगभग सत्तर वर्ष बाद भी क्यों हिंसात्मक प्रवृत्तियां आंदोलनों में लगातार बढ़ रही हैं, यह एक विचारणीय प्रश्न है।

शांतिपूर्ण आंदोलनों और जन आकांक्षाओं के प्रति सत्ता प्रतिष्ठानों की उपेक्षा, भेदभाव, अवहेलनापूर्ण दृष्टि, संवादहीनता और उससे उपजी कुंठा, निराशा व मोहभंग प्रमुख कारक हैं। स्वतंत्रता के बाद के आंदोलनों का विवेचन करें तो बांधों से विस्थापितों के लिए ‘जमीन के बदले जमीन’ व उचित मुआवजे की मांग से प्रारंभ होकर वैकल्पिक विकास का बायस बना ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ और सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के विरुद्ध इरोम शर्मिला की लगभग पंद्रह वर्ष से सतत भूख हड़ताल सर्वाधिक लंबे समय तक शांतिपूर्ण ढंग से संचालित आंदोलन माने जा सकते हैं। नर्मदा बचाओ जैसे शांतिपूर्ण आंदोलनों को विकास विरोधी, विदेशी मदद से संचालित आदि तरह-तरह के आरोप लगाकर बदनाम करने और हठधर्मिता व तानाशाहीपूर्ण तरीके से कुचलने के प्रयास लगातार किए गए हैं। विस्थापितों को आज तक उचित मुआवजा नहीं दिया गया है, न्यायालयों में झूठे हलफनामों तथा मुआवजा वितरण में गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे हैं।

दूसरी ओर रेल सुविधा बाधित करने, जनधन और राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, तोड़फोड़ करने, नागरिक आजादी को बंधक करने जैसे आंदोलनों के समक्ष सरकारें आसानी से झुकती नजर आई हैं जिसका ताजा उदाहरण हरियाणा का हाल ही का आरक्षण आंदोलन है। इन उदाहरणों से यही संदेश जाता है कि लोकतांत्रिक, अहिंसक और शांतिपूर्ण आंदोलनों के बरक्स उग्र और हिंसक आंदोलनों के प्रति सरकारें अधिक सकारात्मक संवेदनशीलता प्रदर्शित करती हैं।

एक तीसरा आयाम सशस्त्र आंदोलनों का है जिसमें नक्सलवादी और माओवादी सशस्त्र हिंसक आंदोलनों को रखा जा सकता है। सत्तर के दशक से प्रारंभ नक्सलवादी, माओवादी सशस्त्र आंदोलनों पर जवाबी कार्रवाई, आपरेशन ग्रीनहंट, सलवा जुड़ूम जैसे प्रयोगों के बाद भी नियंत्रण क्यों नहीं किया जा सका है? क्यों और कैसे नक्सलवाडी से प्रारंभ होकर इसका विस्तार देश के इतने बड़े भूभाग पर हो पाया है? जल, जंगल, जमीन के सवाल, आदिवासियों के प्रति भेदभाव, अन्याय, अत्याचार और शोषण का निवारण किए बगैर क्या इस समस्या का स्थायी हल निकल पाएगा?

इस समस्या के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलू को हल कर आदिवासियों का विश्वास हासिल करना पडेगा, सलवा जुड़ूम जैसी विभाजनकारी और आपस में लड़ाने वाली नीतियों से बचना होगा। हिंसा व प्रतिहिंसा में बेकसूर पुलिसकर्मी, निर्दोष नागरिक और आदिवासी हताहत हो रहे हैं और जिन आदिवासियों के हितों के नाम पर संघर्ष किया जा रहा है वे तो दो पाटों के बीच पिस रहे हैं। ऐसे में सशस्त्र संघर्ष के अगुआओं को भी खून का खेल बंद करना होगा और लोकतांत्रिक तरीका अपनाना होगा। (सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर)

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सकारात्मक पहल
यह बहुत अफसोसनाक है कि हिंदी को आजादी के बाद से ही कुछ प्रदेशों में विरोध का सामना करना पड़ा है, कभी मजहब तो कभी क्षेत्रवाद के नाम पर। लेकिन यह हिंदी की शैली और जीवनी शक्ति ही है जो वह निरंतर विकास के मार्ग पर अग्रसर है। इन दिनों आईपीएल मैचों में देखा गया है कि टीवी स्क्रीन पर खिलाड़ियों के नाम हिंदी में भी दिए जा रहे हैं। यह एक सकारात्मक पहल है। सभी भारतीयों को हिंदी को बढ़ावा देने के प्रयास करने चाहिए।
(सालिम मियां, अलीगढ़)
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गांव की ओर
दिल्ली जैसे बड़े शहर अपने आसपास के गांवों को निगलते जा रहे हैं। कंपनियां ही क्यों, रिहायशी कॉलोनियां, मॉल और परिवहन के संसाधन भी शहर के किनारे की ओर निकल रहे हैं। जहां शहर बसाए जा रहे हैं वहां से या तो जंगल खत्म किए जा रहे हैं या फिर उपजाऊ जमीन। हर तरह से पर्यावरण के लिए भारी संकट है। बढ़ती भीड़ को या तो एक-दूसरे के ऊपर खांचों में भर दिया गया है या फिर शीशों में फिट कर दिया गया है। सोचिए, जितने लोग मिलकर एक बड़े क्षेत्र के गांव में रहते थे उतने अब कुछ गज ऊंची एक बहुमंजिला इमारत में आराम से रह रहे हैं। शहरों में खुली हवा का नामोनिशान तक नहीं है। पचहतर प्रतिशत मकानों में खिड़कियां नहीं हैं, लेकिन एसी और पंखों की खपत इतनी है कि अब तो खुली हवा जैसा कुछ ध्यान ही नहीं रहता।

इस बढ़ते शहरीकरण की कीमत हम ही चुका रहे हैं। भले कृत्रिम संसाधनों से जीवन शैली में कोई अभाव नहीं दिखता लेकिन आने वाले समय में इसकी बड़ी कीमत हम ही चुकाएंगे। सुबह का भूला शाम को फिर गांव की ओर ही लौटेगा, इसलिए हमें गांवों को बचाना होगा। (विनय कुमार, आईआईएमसी, दिल्ली)
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अमन के दुश्मन
कश्मीर में कुछ ऐसे तत्त्व हैं जो वहां शांति नहीं चाहते। शांति होगी तो उनकी पूछ नहीं होगी। अशांति में ही इनका मन रमता है और इनकी दुकानदारी चलती है। हंदवाड़ा की घटना में जिस लड़की के साथ दुर्व्यवहार की बात कही गई और बवाल मचा, उसने सेना के जवानों पर कोई आरोप नहीं लगाया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि कश्मीर में ये अलगाववादी जिन्हें पाकिस्तान से पूरा समर्थन मिलता है, ऐसी अफवाहें फैलाकर भारत और भारतीय सेना के खिलाफ माहौल बनाने में जुटे रहते हैं। पहले भी कई बार ऐसा हुआ है। यह सब एक सोची-समझी रणनीति के तहत हो रहा है।

पिछले दिनों एक टीवी चैनल पर हंदवाड़ा की घटना के बारे में सेना के एक रिटायर्ड अधिकारी के इस कथन पर हमें गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा, ‘एक तो हमारी सेना उपद्रवों पर काबू पाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दे, समय-असमय-कुसमय अपनी सेवाएं देश को समर्पित करे और तिस पर उसके आचरण पर ही अंगुली उठाई जाए।… बुला ले सरकार इन जवानों को वापस और भेज दे इन्हें सरहदों पर। इनका काम देश की सीमाओं की रक्षा करना है, न कि देश के भीतर हो रही सर-फुटव्वल में कोई भूमिका निभाना।’ (शिबन कृष्ण रैणा, अलवर)

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