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प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार दोनों के आला अधिकारी, वन विभाग, वायु सेना, राष्ट्रीय आपदा राहत बल आदि के छह हजार कमचार्री इसे बुझाने में लगे हैं।
Author नई दिल्ली | May 3, 2016 03:07 am
उत्तराखंड के कोटद्वार में लगी आग। (पीटीआई फोटो)

‘जंगल लगाने से नहीं बचाने से पनपता है’, टिहरी गढ़वाल की एक बूढ़ी ग्रामीण महिला के ये शब्द मुझे आज भी याद हैं जो करीब दो दशक पहले उन्होंने मेरे एक मित्र द्वारा तैयार वीडियो डाक्यूमेंट्री में कहे थे। उत्तराखंड से 1970 के दशक में चिपको आंदोलन की जो गूंज उठी थी उसे पूरी दुनिया ने सुना। लेकिन आज वही उत्तराखंड जंगलों में लगी भीषण आग के कारण मीडिया की सुर्खियों में है। प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार दोनों के आला अधिकारी, वन विभाग, वायु सेना, राष्ट्रीय आपदा राहत बल आदि के छह हजार कमचार्री इसे बुझाने में लगे हैं। पहली बार हेलीकाप्टर से पानी बरसा कर आग की लपटों को शांत करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इतने बड़े तामझाम और भारी खर्च के बावजूद अभी तक खास सफलता नहीं मिल सकी है।

सवाल है कि क्या हमारी रणनीति सही दिशा में है? शायद नहीं। क्योंकि मेरे विचार से दावाग्नि से जंगलों को बचाने पर पहले ध्यान देना चाहिए ताकि आग लगे ही नहीं। अधिकतर मामलों में आग लगने के कारण प्राकृतिक न होकर मानवीय होते हैं, अक्सर लापरवाही से अनजाने में तो कभी-कभी स्वार्थी तत्त्व जानबूझ कर भी आग लगते हैं। उत्तराखंड में जंगलों के आसपास गांव हैं, जिनमें लोग बसते हैं, विदेशों की तरह मीलों तक वहां वीरान इलाका नहीं होता। हर गांव में या आसपास स्कूल हैं। क्या स्कूल के बच्चों को जागरूकता का माध्यम नहीं बना सकते? साथ ही गांव-गांव जाकर लोगों के साथ दावाग्नि नियंत्रण की बातचीत नहीं कर सकते? दावाग्नि का सबसे ज्यादा नुकसान लोगों, विशेषकर ग्रामीणों, को ही होता है। र्इंधन, चारा-पत्ती, पशु-बिछावन, इनसे बढ़ कर जल-स्रोत से वंचित हो जाते हैं। जंगली जानवरों के गांवों में आने की समस्या, जो प्रदेश में पहले से गंभीर है, और बढ़ेगी। ये समझाने की बात है।

गौरतलब है कि वन विभाग जन सहयोग की अपेक्षा अपने गिने-चुने कर्मियों, टेक्नोलॉजी, बजट पर ज्यादा ध्यान देता है और ज्यादा भरोसा करता है। दावाग्नि यहां कोई नई चीज नहीं है, ब्रिटिश शासनकाल से ही ऐसे मामले होते रहे हैं और लगभग हर साल कम-ज्यादा मामले सामने आते रहते हैं। सवाल है कि इनसे क्या सबक सीखा है? अनुभवों का क्या लाभ मिला? प्राथमिकता होनी चाहिए कि जंगल में आग लगे ही नहीं, जो ऐसा कर रहे हैं उन्हें पकड़ने और दंड देने में जन सहयोग मिल सकता है, लेकिन सूचना देने वालों को सुरक्षा का भरोसा मिलना चाहिए और पुरस्कार भी। वन विभाग के लोगों को जंगल की देखभाल के लिए मोटी तनख्वाह और तमाम सुविधाएं मिलती हैं, लेकिन ग्रामीणों से अपेक्षा होती है कि वे मुफ्त में, केवल प्रेरणा से आग बुझाने में सहयोग दें, जबकि उन्हें जंगल का मालिक माना ही नहीं गया है। आरक्षित वन क्षेत्र में उनके घुसने तक की मनाही है।

आग लगने से रोकना और आग लगते ही, फैलने से पहले बुझाना आसान है। लेकिन इन दोनों के प्रति सरकारें उदासीन हैं। जब आग भयंकर रूप ले चुकी होती है, तभी नींद से जागते हैं। लेकिन तब तक बहुत देर हो जाती है। (कमल जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड)
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बदलाव की ओर
इन दिनों बिहार खासा चर्चा में है। लोग यहां पूर्ण शराबबंदी की बातें कर रहे हैं। कुछ इससे बहुत खुश नजर आ रहे हैं तो कुछ निराश भी हैं। सुशासन बाबू का इतना बड़ा फैसला वाकई समाज में एक बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। कुछ लोग शराबबंदी को मौलिक अधिकारों का हनन बता रहे हैं। लेकिन उन्हें मालूम होना चाहिए कि नशा सामाजिक विघटन की जड़ है। इससे मुक्ति पाने के लिए जो भी कदम उठाए जाने चाहिए उनमें विलंब न हो तभी समाज सही दिशा में आगे बढ़ पाएगा। चुनावी जंग में विजय पताका फहराने के लिए भी अब शराबबंदी ब्रह्मास्त्र बन गया है। नेतागण अब कालाधन वापसी, गरीबी निवारण और बिजली-पानी मुहैया कराने वाले नारों से कुछ कदम आगे बढ़ कर पूर्ण शराबबंदी के नारे बुलंद कर रहे हैं। शराबबंदी का यह दौर थमना नहीं चाहिए। (गौरव मिश्र, नोएडा)
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घूस पर झूठ
संपादकीय ‘सौदा और सियासत’ (28 अप्रैल) के संदर्भ में मुझे कहना है कि मुख्य मुद्दा है हेलीकॉप्टर की खरीद में घूस का लिया और दिया जाना। राजनेता इसे तरह-तरह से भटकाने की कोशिश कर रहे हैं। घूस किसने ली, इस पर कोई कुछ नहीं बोलता। इटली के हाइकोर्ट ने अपने निर्णय में इस सौदे में भारत के जिन लोगों का नाम शामिल किया है वे देश के शीर्ष नेता हैं। कभी इस बात पर विवाद उठाया जाता है कि हमने सौदा कैंसिल किया। नेता विपक्ष राज्यसभा ने दावा किया कि उनकी पार्टी की सरकार ने इस आर्डर को रद्द किया और इस कंपनी को काली सूची में डाला। यह बाद में झूठ निकला। हमारे राजनेताओं को जरा भी अफसोस नहीं है कि उन्होंने भारत जैसे महान देश का नाम मिट्टी में मिला दिया है।
मीडिया की भूमिका भी सराहनीय नहीं रही है। मीडिया के व्यवहार से लगता है कि वह घूसखोरों के समर्थन में खड़ा है। कोई मीडियाकर्मी इस बात पर जोर नहीं देता कि वे कौन लोग हैं जिन्होंने घूस ली है। क्या हम भ्रष्ट नेताओं की ऐसी भ्रष्ट शासन व्यवस्था झेलने को अभिशप्त हैं? (एस शंकर सिंह, द्वारका, नई दिल्ली)
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रोग और निदान
भारत में मौसम के अनुसार विभिन्न बीमारियों का जन्म होता है। कभी मलेरिया, कभी चिकनगुनिया तो कभी डेंगू जैसी खतरनाक बीमारियां मौसम के अनुसार जन्म लेती हैं। सरकार इन्हें रोकने के लिए समय-समय पर कदम उठाती है, लेकिन उसके बावजूद जनता के लापरवाही बरतने पर इन बीमारियों का जन्म के उपरांत विकास होता है और वे अनेक परिवारों को अपनी चपेट में ले लेती हैं। सरकार तो समयानुरूप कदम उठाती है, लेकिन जनता को भी बहुत ज्यादा जागरूक होना होगा। जब तक हम इन बीमारियों से निबटने के लिए जागरूक नहीं होंगे, इन्हें पछाड़ नहीं पाएंगे। लिहाजा, व्यापक स्तर पर कदम उठाने की जरूरत है। (विजय कुमार धनिया, दिल्ली विश्वविद्यालय)

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