December 05, 2016

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चौपालः सीमा पर विचार

प्राकृतिक रूप से हमारी पृथ्वी पर राष्ट्रों के मध्य कोई सीमा रेखा नहीं है। राष्ट्रों ने प्रशासनिक सुविधा से भाषा और सांस्कृतिक विविधता के आधार पर सीमाओं का निर्माण किया।

Author October 20, 2016 02:30 am

प्राकृतिक रूप से हमारी पृथ्वी पर राष्ट्रों के मध्य कोई सीमा रेखा नहीं है। राष्ट्रों ने प्रशासनिक सुविधा से भाषा और सांस्कृतिक विविधता के आधार पर सीमाओं का निर्माण किया। कुछ स्थितियों में सीमाएं औपनिवेशिक विरासत की देन हैं जैसा कि अफ्रीका और एशिया के अधिकांश देशों की सीमाएं।
सीमाओं के निर्माण के साथ ही उनकी सुरक्षा सभी देशों की प्राथमिकता रही है। अधिकतर विकासशील राष्ट्र, जिनकी प्राथमिकता आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन होनी चाहिए, अपनी वार्षिक आय का एक बढ़ा हिस्सा सीमा की सुरक्षा तथा सेना के रखरखाव पर व्यय करने पर विवश हैं। इसके विपरीत यूरोप महाद्वीप के अधिकांश देशों के मध्य कोई सीमा बंदी नहीं है। सीमाएं वहां प्रशासनिक उद्देश्य के लिए सिर्फ कागजों पर अंकित हैं। जाहिर है कि इन्हें स्थायी सेना रखने की भी आवश्यकता नहीं है और ये अपने प्राकृतिक एवं मानव संसाधनों।का प्रयोग रचनात्मक कार्यों में कर सकते हैं।


कल्पना करें कि विश्व के सभी राष्ट्र आपसी सहमति से अपने बीच भौतिक सीमाओं को खत्म कर दें तो क्या होगा? रक्षा बजट में भारी कमी होगी और विकास कार्यों का बजट बढ़ेगा। देखा जाए तो यह सभी देशों के लिए लाभदायक स्थिति होगी। फिर इससे हानि किसे होगी? जी हां, हानि तो होगी अमेरिका, फ्रांस और शांति का उपदेश देने वाले उन सभी विकसित राष्ट्रों की जिनकी अर्थव्यवस्था भारत, पाकिस्तान और ऐसे सभी तीसरी दुनिया के देशों को अत्याधुनिक रक्षा उपकरणों के निर्यात के सहारे चल रही है।
यह शोध का विषय हो सकता है कि कहीं इन्हीं विकसित देशों और उनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के वाणिज्यिक हितों को ध्यान में रख कर ही आज तक कभी विकासशील राष्ट्रों के सीमा विवादों को सुलझाने की गंभीर कोशिश नहीं की गई? अगर इन्होंने आपसी विवाद सुलझा लिए तो फिर विकसित देशों से मिसाइलें और पनडुब्बियां कौन खरीदेगा? आखिर क्या कारण है कि जब पूर्व और पश्चिम जर्मनी एक हो गए तो भारत और पाकिस्तान सत्तर सालों में भी कश्मीर विवाद क्यों नहीं सुलझा पाए? भारत और पाकिस्तान के अवसरवादी और भ्रष्ट राजनेताओं से तो कोई उम्मीद करना व्यर्थ ही है पर काश, दोनों देशों की जनता यह समझ पाती कि सच्ची देशभक्ति केवल सीमा पर जाकर दुश्मन देश के सैनिकों को मारने में नहीं बल्कि देश के संसाधनों का प्रयोग नागरिकों का जीवन स्तर उन्नत करने में है।
’अनिल हासानी, ओम नगर, भोपाल

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First Published on October 20, 2016 2:00 am

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