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पूंजी की सत्ता

इस साल के बजट से शीशे की तरह साफ है कि हमारे वर्ग-विभाजित समाज में सरकार किस वर्ग के हित में कार्यरत है और राष्ट्रीय रूप से स्वीकृत आर्थिकी का मूल उद्देश्य क्या है? एक ओर संपत्ति कर को हटा दिया गया और कारपोरेट टैक्स तीस फीसद से घटा कर पच्चीस फीसद कर दिया गया […]
Author April 29, 2015 09:35 am

इस साल के बजट से शीशे की तरह साफ है कि हमारे वर्ग-विभाजित समाज में सरकार किस वर्ग के हित में कार्यरत है और राष्ट्रीय रूप से स्वीकृत आर्थिकी का मूल उद्देश्य क्या है?

एक ओर संपत्ति कर को हटा दिया गया और कारपोरेट टैक्स तीस फीसद से घटा कर पच्चीस फीसद कर दिया गया तो दूसरी ओर गरीबों से उनके रोजगार की गारंटी छीनी जा रही है। कारपोरेट जगत के लिए 5.90 लाख करोड़ रुपए की कर-रियायत मंजूर की गई यानी आम लोगों पर लगाए गए करों से जमा सरकारी राजस्व भी मूलत: संपन्नों (पूंजीपतियों) की संपन्नता बढ़ाने में खर्च होता है! इतना ही नहीं, वित्तीय संस्थाओं को बचाने के लिए अरबों डॉलर के सरकारी पैकेज पर फिर गौर किया जा सकता है।

दरअसल, चंद लोगों के मुनाफे को समर्पित पूंजीवादी आर्थिकी का यह एक मुख्य लक्षण है। इसी कारण गरीबों से जुड़ी ‘मनरेगा’ हो या अन्य आर्थिक कार्यक्रम या किसी राहत पैकेज के घोषित होते ही पूंजीवाद के पैरोकारों के पेट में मरोड़ उठने लगती है लेकिन ‘सेज’ पर वे आराम से मौन लेट जाते हैं। ऐसा लगता है कि कांग्रेस-मुक्त भारत अभियान को त्याग कर मोदी एंड कंपनी ‘किसान मुक्त भारत’ कार्यक्रम को अंजाम देने में लग गई है। रायसीना हिल्स समेत पूरे देश में किसानों की आत्महत्याएं बदस्तूर जारी हैं। मोदी मस्त और किसान पस्त!

देश भर में हजारों संगठन, जो अब तक अलग-अलग स्थानीय मुद्दों पर कुछ सुधारवादी कार्यक्रमों के तहत आंदोलित होते रहे हैं, उन सबको मोदी का पूंजीवाद को जन-जन में पिरोने का आक्रामक तौर-तरीका सोचने के लिए विवश कर गया है। उन सबने एक राष्ट्रव्यापी जनांदोलन की संभावना पर विमर्श भी शुरू कर दिया है।

उधर मुख्यधारा के कम्युनिस्टों का इस ऐतिहासिक नियतिवाद में भरोसा है कि पूंजीवाद एक बदलती हुई अवस्था है और उसके बाद साम्यवाद का आना लाजिमी है। ठीक है, पर हमें मार्क्स की तरह यह भी समझना होगा कि यह काम स्वत: सिर्फ आर्थिक परिवर्तनों के कारण नहीं हो जाएगा। पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था से साम्यवादी उत्पादन व्यवस्था तक छलांग केवल मानवीय उद्यम से संभव हो सकती है क्योंकि पूंजीवाद तब तक जिंदा रहेगा जब तक वह उत्पादन के औजारों में लगातार क्रांतिकारी परिवर्तन और उसके फलस्वरूप उत्पादन के संबंधों में, और साथ-साथ समाज के सारे संबंधों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने में सफल होता रहेगा। पिछली सदी के अंतिम दशक में शिथिल पड़ रहे पूंजीवाद को संचार (नेट, मोबाइल आदि) क्रांति ने संबल प्रदान किया और उम्मीद है कि वर्तमान मंदी के दौर (2008 से जारी) से भी यह बाहर निकल आएगा गरीबों को और गरीब बनाकर। भूमि अधिग्रहण कानून को इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है।

पूंजीवाद का उत्पाद- पूंजीवादी लोकतंत्र- ही पूंजीवाद का खात्मा करेगा। इस उत्पाद का सहारा लेकर वह समाज को खंड-खंड में बांट कर (मसलन, केरल में निबंधित मजदूर संघोंं की संख्या तकरीबन दस हजार है) अल्पमत की तानाशाही (यानी पूंजी की तानाशाही) अवाम पर बनाए रखने में सफल होता रहा है। गौरतलब है कि वर्तमान सरकार समेत अब तक की तमाम सरकारें अल्पमत की रही हैं। इसलिए एंगल्स के शब्दों में, इसका निदान सिर्फ विशाल बहुमत का आंंदोलन, जो विशाल बहुमत के फायदे के लिए होनेवाला चेतन और स्वतंत्र आंदोलन होगा, है। इस आंदोलन के बल पर चुनाव द्वारा गठित सरकार संविधान में अपेक्षित परिवर्तन या तो संसद से और तथाकथित मूल स्थापनाओं को बदलने पर उच्चतम न्यायालय के संभावित विरोध की स्थिति में रायशुमारी द्वारा करके अवाम को हमेशा-हमेशा के लिए वर्गीय शोषण से मुक्तकर ऐसी व्यवस्था कायम करेगी जिसमें सबके स्वतंत्र विकास की पूर्व शर्त प्रत्येक का स्वतंत्र विकास होगी। तभी फ्रांस की क्रांति का नारा ‘स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व’ या भारतीय दर्शन ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ अपने वास्तविक अर्थों में परवान चढ़ेगा। गांधी का अहिंसक राज्य भी इसी रास्ते स्थापित होगा।

इस दिशा में प्रस्थान के लिए संगठित मजदूर वर्ग और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को इकट््ठे गौर करना होगा कि पूंजीवादी पीड़ा से गुजरने के समयांतराल को कैसे कम किया जाए और जरूरत पर आधारित समावेशी आर्थिकी की ओर उठाए जाने वाले कार्यक्रमों को कैसे अमली जामा पहनाया जाए। उन्हें सार्थक वाद-विवाद को पहला पासा बनाना होगा।

 

’रोहित रमण, पटना विश्वविद्यालय

 

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