ताज़ा खबर
 

आतंक का जाल

आज आइएस की तकनीकी दक्षता ने पूरी दुनिया को दहला दिया है। तकनीक में इतना माहिर इसके पहले शायद ही कोई और आतंकी संगठन रहा हो।
Author नई दिल्ली | January 18, 2016 21:33 pm
फुटबाल प्रेमी और एक अच्छा छात्र रहे जैक ने अपने माता-पिता के साथ बातचीत में स्वीकार किया कि वह सितंबर, 2014 में सीरिया में आईएसआईएस के साथ जुड़ गया।

आज सारी दुनिया आतंकवाद को लेकर चिंतित है और इसे मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया जा रहा है। इससे निपटने के लिए विश्व समुदाय को आतंकवाद के टेक्नोलॉजी से जुड़े पहलू की तरफ भी ध्यान देना होगा। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इंटरनेट आतंकियों की भर्ती का जरिया न बन पाए। आज आइएस की तकनीकी दक्षता ने पूरी दुनिया को दहला दिया है। तकनीक में इतना माहिर इसके पहले शायद ही कोई और आतंकी संगठन रहा हो। आइएस ने अपना जाल फैलाने, भर्तियां करने और अपने समर्थकों को जोड़े रखने, अपने ‘कार्यकर्ताओं’ को निर्देश देने, अपने लक्ष्यों और धमकियों का प्रचार करने और मीडिया का ध्यान खींचने आदि के लिए इंटरनेट का खूब इस्तेमाल किया है। उसके पास क्रय-शक्ति की भी कमी नहीं है, क्योंकि सीरिया और इराक, दोनों के एक बड़े हिस्से पर उसका कब्जा होने से तेल के कई कुएं उसके नियंत्रण में हैं। बर्बरता, पैसा और तकनीक, इन तीनों के मेल ने आइएस को दुनिया का सबसे खतरनाक संगठन बना दिया है।

इंटरनेट के जरिए ही उसने कई पश्चिमी देशों में भी छिपे समर्थक तैयार कर लिए हैं। पेरिस हमले के सिलसिले में चल रही जांच और धरपकड़ से भी यह जाहिर है। निजी कंप्यूटर में दर्ज आंकड़ों और सूचनाओं की गोपनीयता या निजता को लेकर सारी दुनिया में नए सिरे से बहस खड़ी हुई है, तो उसका बड़ा कारण आतंकवादी संगठनों के द्वारा इंटरनेट का बढ़ता इस्तेमाल ही है। पल भर में जहां चाहें वहां सूचनाएं और संदेश भेजे जा सकते हैं, पल भर में पैसा कहीं से कहीं पहुंच जाता है। यों बम और बंदूक जैसे तरीकों से भी काफी खून बहा है। लेकिन 9/11 ने बता दिया कि अब ज्यादा खतरा नए किस्म के हमलावरों से है। यही नहीं, अब अंदेशा इस बात का भी है कि कहीं परमाणु बम या रासायनिक हथियार या जैविक हथियार आतंकियों के हाथ न लग जाएं या वे इन्हें बनाने में कामयाब न हो जाएं। आतंकवादियों की तरफ से साइबर हमले का भी खतरा जताया जाता है।

आतंकवादी पुराने तरीकों को काम में लाने के साथ ही अपनी साजिशों को और भयावह बनाने की कोशिश करते रहते हैं। लिहाजा, उनसे निपटने की रणनीति में सरकारों के लिए भी अत्याधुनिक तकनीकों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना जरूरी होता गया है। उनकी जरा-सी ढिलाई और चूक किसी आतंकवादी संगठन को कहर ढाने का मौका दे सकती है। आज हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर आतंकवाद से लड़ने का संकल्प दोहराया जाता है और इसके उपायों पर चर्चा होती है, तो इसीलिए कि आतंकवाद ने अंतरराष्ट्रीय शक्ल अख्तियार कर ली है। इसमें इंटरनेट उनके लिए सहायक साबित हुआ है। तकनीक में दोतरफा संभावना होती है। हमें सोचना होगा कि बुरी संभावना पर कैसे नकेल कसी जाए। (अमित शुक्ल, राजेंद्र नगर, पटना)

…………………

सतर्कता जरूरी
रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा है कि जो हमें दुख देगा हम भी उसे दुख देंगे। उन्होंने कड़े शब्दों में पाक को चेतावनी दी कि वह छद््म युद्ध बंद करे नहीं तो उसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है क्योंकि अब भारत की सहने की क्षमता खत्म हो रही है। चेतावनी तो अपनी जगह ठीक है लेकिन पठानकोट में आतंकी हमले के बाद हमें पूरी तरह से सतर्क रहने की जरूरत है ताकि आगे इस तरह का दर्द न झेलना पड़े। आतंक से निपटने के लिए बाहर से ज्यादा अपने घर की सफाई जरूरी है। हमारी सेना में ‘हनी ट्रैप’ या अन्य माध्यमों से घुसपैठ की कोशिश हो रही है जो चिंताजनक है। हाल ही में एक जवान को पकड़ा गया जिस पर पठानकोट एयरबेस का नक्शा आइएसआइ को पहुंचाने करने का आरोप है। ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए। (दुर्गा प्रसाद मिश्र, सेक्टर-12, नोएडा)

………………

बस्ते का बोझ
‘बस्ते का बोझ और बालमन’ (17 जनवरी) लेख कई मायनों में महत्त्वपूर्ण है। सबसे ज्यादा जरूरी है कि शिक्षण की प्रक्रिया को ‘बाल-केंद्रित’ बनाया जाए। बच्चों के जीवन का हिस्सा उनकी पाठ्यपुस्तक में शामिल किया जाए। इससे बालमन में पाठ्यक्रम के प्रति लगाव पैदा हो पाएगा और बच्चे ऊबने के बजाय रुचिपूर्ण तरीके से अध्ययन-अध्यापन का आनंद ले पाएंगे।

प्रेमपाल शर्मा ने बस्ते के बोझ पर सही व्यंग्य किया है कि ‘मूर्खों का ही बस्ता सबसे ज्यादा भारी होता है।’ सही मायने में हम शिक्षण की प्रक्रिया में समस्त ज्ञान को बस्ते में ही ठूंस देना चाहते हैं, जो बच्चों के जीवन के साथ एक क्रूर मजाक है।

क्या हम कभी इस विचार की कल्पना कर सकते हैं कि बच्चे अपनी मनपसंद वस्तु को बस्ते में रख पाएं। मसलन, उनके बनाए गए कार्टून, ग्रीटिंग कार्ड, कागज की नाव और खिलौना आदि। इस तरह हम एक नई किस्म के प्रयोग के जरिए बच्चों के भविष्य को सुंदर बना सकते हैं। (शन्वी श्रीवास्तव, दिल्ली विश्वविद्यालय)

………………….

परंपरा के बहाने
क्या परंपरा का हवाला या आस्था की दुहाई देकर समाज के आधे हिस्से के साथ भेदभाव किया जा सकता है? ताजा मामला सबरीमाला मंदिर से संबंधित है जहां की प्रबंधन कमेटी ने अपनी परंपरा का हवाला देते हुए मासिक धर्म की आयु की महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित कर दिया। यह कोई नई घटना नहीं है। कुछ समय पहले महाराष्ट्र के शनि शिंगनापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मामला सुर्खियों में था।
सबरीमाला-शिंगनापुर जैसे न जाने कितने मंदिर हमारे देश में होंगे जहां धर्म के ठेकेदार परंपरा का हवाला देकर महिलाओं को अपवित्र साबित करने पर तुले होंगे। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वैज्ञानिकता के इस दौर में भी हमारा समाज इसे स्वीकार कर रहा है जबकि संविधान की धारा 25 हर व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार घूमने, उसका प्रचार करने का अधिकार देती है।

अगर मामला स्त्री की कथित अपवित्रता का है तो सवाल यह भी होना चाहिए कि यह अपवित्रता हमें सिर्फ धार्मिक स्थलों की दहलीज पर क्यों नजर आती है? रसोई में क्यों नहीं दिखती जब एक स्त्री परिवार के तमाम लोगों को खाना बना कर खिलाती है? अस्पतालों में तब क्यों नहीं दिखती जब डॉक्टर या नर्स के रूप में स्त्रियां लोगों को मौत के मुंह से वापस लाती हैं? (जैनबहादुर, जौनपुर)

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.