December 04, 2016

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चौपालः राज और नीति

राजनीति में दो तरह के लोग होते हैं- एक वे जो सिर्फ राज करना चाहते हैं, नीति चाहे कोई भी हो और दूसरे वे जो सिर्फ नीति पर चलना चाहते हैं, चाहे राज करने को मिले या न मिले।

Author October 19, 2016 03:04 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

राजनीति में दो तरह के लोग होते हैं- एक वे जो सिर्फ राज करना चाहते हैं, नीति चाहे कोई भी हो और दूसरे वे जो सिर्फ नीति पर चलना चाहते हैं, चाहे राज करने को मिले या न मिले। राज करना चाहने वालों में से कुछ तो स्वयं ऐसा समझते हैं या उनके सिपहसालार यह कहते नहीं अघाते कि वे सिर्फ राज करने के लिए बने हैं और चाहें तो रात के बारह बजे से राज करना शुरू कर सकते हैं। दूसरी तरफ कुछ ऐसे हैं जिनके कान ‘भैयाजी लाओ-देश बचाओ’ टाइप के नारे सुन-सुन कर जब कार्बाइड से पके फलों की तरह समय से पहले ही पकने लग जाते हैं तो फिर इन्हें ‘सती माता की जयजयकार’ के नारों के बीच पति की मृत्यु शैया पर सती होने को बाध्य कर दी गई ‘सती माता’ की तरह मजबूर होकर उचित स्थान ग्रहण करना ही पड़ता है। इन लोगों ने अपनी आंखें खुलते ही परिजनों को सिर्फ लोगों के सलाम स्वीकार करते, गरजते-बरसते या कभी कभार लोगों या सभाओं को संबोधित करते ही देखा है। राजनीति का ‘राज’ इनके लिए बांहें फैलाए खड़ा होता है और नीतियां हमेशा इनकी अनुगामिनी होती है।

दरअसल ‘राजनीति’ व्याकरण की दृष्टि से वह समास है जिसका पहला सामासिक पद ‘राज’ कुछ गिने चुने लोग या घराने हथिया चुके हैं। बचा दूसरा पद ‘नीति’ जिसे चंद गिने-चुने लोगों ने कुछ ऐसा जकड़ या पकड़ रखा है कि किसी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। ये लोग राजनीति में आए या आना चाहेंगे तो सिर्फ नीति के कारण। नीति ही इनका इश्क है, नीति ही इनका ईमान है। ये अपने जैसा दूसरों को भी बनाना चाहते हैं। नीति इनका साध्य है और धरना, घेराव, प्रदर्शन, पुतला-दहन या फिर सवाल-जवाब इनके साधन। कल गांधी और जेपी बन कर ये लोग पहले वालों की नाक में दम करते रहे और आज भी उनके कुछ वंशज हैं जो कुछ ऐसी ही छिटपुट वारदात करते रहते हैं। ऐसे एक बाबाश्री ने योगाभ्यास द्वारा पहले देश का शारीरिक घोटाला उजागर किया, फिर काले धन की वापसी की मांग करके आर्थिक घोटाले की खबर ली। मगर खानदानी लोगों से पंगा लेने के चक्कर में सार्वजनिक मंच से उन्हें एक बार भेस बदल कर गायब होना पड़ा।
वैसे आजादी के बाद से अधिकतर नीतिपकड़ लोगों को नीति पद को धीरे-धीरे ‘अ’ उपसर्ग लगाकर ‘अनीति’ बना कर अपनाना ज्यादा सुहा रहा है। ऐसे लोगों के कुनबे में दिन दूनी और रात चौगुनी वृद्धि हो रही है और इन्होंने राज करते हुए या राज प्राप्त करने का प्रयास करते हुए नीतियों की भोंगली बना कर दादाजी के जमाने में आने वाली चिट्ठियों की तरह दीवार के किसी छेद में खोंस कर रख दी है। ऐसों से भिड़ने एक और बाबा आए। इन बाबा ने भी खूब किला लड़ाया। मगर इनके सामने बच्चों की कसम खाने वाले इन्हें ही ठेंगा दिखा गए। आखिर बाबा को भी वानप्रस्थ जाना ही पड़ा। इनकी टोपी को धारण कर ‘सारे घर के बदल डालूंगा’ टाइप की जिद लेकर चलने वाले ये नीतिवान एक बार राज तो पा गए मगर इनका सारा समय कभी किसी की डिग्री तलाशने में, कभी किसी के खिलाफ ट्विटर पर जंग लड़ने में और कभी बैंकों द्वारा सामने खड़े जीवित पेंशनजीवी से मांगे जाने वाले जीवित होने के प्रमाणपत्र की तरह सेना के कारनामों के सबूत मांगने में ही जाया हो रहा है। कुछ ‘राज’ करने वाले ऐसे हैं कि पत्थर खा कर भी राज कर लेते हैं और कुछ ऐसे हैं कि चारा खाकर भी पूरे परिवार के साथ राज कर रहे हैं। उधर ‘नीति’ वाले हैं कि इन राज करने वालों को लाइन पर लाने के लिए अपनी नीतियों पर ही पुनर्विचार करने पर मजबूर हो गए हैं। इधर नीति अनुगामियों से अलग होकर एक चमत्कारी सज्जन ने जब ‘इनकी’ पोल खोली तो ‘उनके’ मन में लड््डू फूटने लगे और इन सज्जन में उन्हें वैतरणी पार कराने वाली कामधेनु की अदृश्य पूंछ नजर आने लगी। मगर कामधेनु यकायक ब्रम्होस मिसाइल में तब्दील होकर ‘इन’ के बजाय ‘उन’ का भी लक्ष्यभेद करने लगी तो सारे ‘इन’ से लेकर ‘उन’ तक को समझ में नहीं आया कि आखिर ये भैया हैं ‘किनकी’ तरफ?
आने वाला समय ‘राज’ वालों का होगा कि ‘अनीति’ को ही नीति मानने वालों का…यही देखेंगे, भुगतेंगे या सहन करेंगे हम लोग…
’ओम वर्मा, रामनगर एक्सटेंशन, देवास

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First Published on October 19, 2016 3:03 am

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