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चौपालः जुबान पर लगान

रहीम के दोहे ‘हिये तराजू तोल के तब मुख बाहर आनि’ पर जरा भी गौर किया होता तो दयाशंकर सिंह को उत्तर प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष सहित पार्टी के सभी पदों से हाथ नहीं धोना पड़ता।
Author July 25, 2016 03:00 am
(photo- dreamstime.com)

रहीम के दोहे ‘हिये तराजू तोल के तब मुख बाहर आनि’ पर जरा भी गौर किया होता तो दयाशंकर सिंह को उत्तर प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष सहित पार्टी के सभी पदों से हाथ नहीं धोना पड़ता। लेकिन क्या करें, वे जुबान पर लगाम नहीं लगा सके! उनका पत्रकारों को दिया वह विवादास्पद इंटरव्यू सुना और साथ में पार्टी की कार्रवाई के बाद खेद प्रकट करते हुए बयान भी कि वे तो मायावतीजी का बहुत आदर करते हैं। समझ नहीं आता कि कैसे एक इंसान किसी के प्रति घोर अपमानजनक बात कहते हुए उसका आदर भी कर सकता है! इसीलिए राजनीति और राजनेताओं की बातें गले से नीचे उतरती ही नहीं।

जुबान की तरह व्यवहार में भी संयम खो रहे हैं हम लोग। मायावती के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी जहां दलितों और महिलाओं का अपमान है तो वहीं गुजरात के ऊना कस्बे में हिंदुत्ववादियों द्वारा दलितों की अकारण निर्मम पिटाई की घटना साबित करती है कि राजनीति और वोट-बैंक के लिए दलितों का नाम तो सभी दल जपते हैं, लेकिन संविधान में सभी के लिए समानता के मूल अधिकार के बावजूद न तो समाज बदल पाया है, न समाज का सामंती व्यवहार, न ऐसे अत्याचार करने वालों पर कानून त्वरित और उचित कार्रवाई करता है। हरियाणा के रोहतक की घटना, जिसमें 2013 में सामूहिक बलात्कार की शिकार एक दलित युवती के साथ 2016 में दुबारा उन्हीं आरोपियों ने सामूहिक बलात्कार किया, इसी की पुष्टि करती है। यह अत्यंत शर्मनाक है, लेकिन शर्म की उम्मीद किससे करें? निर्भया मामले में अभी तक न्याय नहीं मिला! बावजूद इसके समाज और व्यवस्था में कहीं शर्मिंदगी महसूस होती नहीं दिखती!

विचारणीय यह भी है कि भाजपा द्वारा दयाशंकर सिंह को तत्काल सभी पदों और फिर पार्टी से निकाल देने के बावजूद मायावती और बहुजन समाज पार्टी ने अभद्र भाषा के इस्तेमाल पर जैसी प्रतिक्रिया दिखाई है, वैसी उत्तर प्रदेश और देश के आम दलितों के साथ आए दिन होने वाले अत्याचारों और उनके अपमान- रोहतक में दलित युवती के साथ दुष्कर्म या केरल में दलित युवती की दुष्कर्म के बाद निर्मम हत्या- के मामलों में क्यों नहीं दिखाई? मायावती को तो एक महिला होने के नाते खुद अपने समर्थकों को दयाशंकर सिंह की पत्नी, बहन और बेटियों के बारे में वैसे ही अभद्र और आपत्तिजनक शब्दों या धमकियों के इस्तेमाल से रोकना चाहिए था। यदि गाली का जवाब गाली से दिया जा रहा है और वह भी आरोपी के निर्दोष परिजनों (महिलाओं) को, तो यह बहुत अफसोस की बात है।

भाजपा उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव के मद््देनजर दलितों को रिझाने के जो प्रयास कर रही थी और मोदीजी डॉ आंबेडकर के प्रति जो निष्ठा जता रहे थे, उन कोशिशों को उन्हीं के लोगों ने धक्का पहुंचाया है और राजनीतिक रूप से कमजोर हो रही बसपा को एक मुद््दा मिल गया है।

यह भी सच है कि कानून बन जाने या संविधान में लिख देने से समाज में बदलाव नहीं आ पाते। अमेरिका में ही देखें। काले और गोरे लोगों के बीच की खाई संविधान और कानून ने कब के पाट दी थी। एक अश्वेत राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद पर चुन कर वाइट हाउस में भी पहुंच गया, लेकिन समाज में क्या काले-गोर का भेद मिट गया? समाज की खाइयों को जल्दी से जल्दी पाटने की कोशिश करनी चाहिए। इन मुद््दों पर वोट की राजनीति करना तो और भी खतरनाक है।
’कमल जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड

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