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चौपालः बेतुके बोल

शंकराचार्य की टिप्पणी पर केंद्रित ‘भय बनाम आस्था’ (संपादकीय, 13 अप्रैल) सार्थक है। यह सच है कि जैसी जटिल स्थितियां देश में आज देखने में आ रही हैं, कम से कम मेरी आयु के लोगों को, जिन्होंने देश की आजादी के पहले दशक में होश संभाला, कभी देखने को नहीं मिलीं।
Author April 16, 2016 02:31 am
जगतगुरू शंकराचार्य

शंकराचार्य की टिप्पणी पर केंद्रित ‘भय बनाम आस्था’ (संपादकीय, 13 अप्रैल) सार्थक है। यह सच है कि जैसी जटिल स्थितियां देश में आज देखने में आ रही हैं, कम से कम मेरी आयु के लोगों को, जिन्होंने देश की आजादी के पहले दशक में होश संभाला, कभी देखने को नहीं मिलीं। इसका एक ही कारण है- कुछ जिम्मेदार लोगों द्वारा हर पांच-सात दिन बाद दिए जाने वाले विवादास्पद बयान। पिछले डेढ़-दो साल से यह सिलसिला थमने का नाम् नहीं ले रहा। हम अपने बुजुर्गों के मुंह से या स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में स्वाधीनता-आंदोलन की कहानियां सुन कर, पढ़ कर बड़े हुए । किशोरावस्था में हर साल तीस जनवरी के दिन रेडियो पर रफी साहब की आवाज में ‘बापू की अमर कहानी’ सुन कर हमारी आंखें भीगती रहीं।

पहला झटका तब लगा था, जब कुछ सिरफिरे लोगों द्वारा महात्मा गांधी के हत्यारे को ‘शहीद’ कह कर सम्मानित करने की बात उठी और उस पर हैरानी यह कि ‘ऊपर वाले’ खामोश। फिर एक के बाद एक, साध्वियों और योगियों वगैरह के बेतुके बयानों की झड़ी लगती गई, देश का हर संवेदनशील व्यक्ति जिनसे आहत होता रहा और बड़बोलों को ‘ऊपर वालों’ का मौन समर्थन मिलता रहा। धर्मनिरपेक्षता और परस्पर सद्भावना के आदर्शों पर टिके लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाई जाने लगीं, देशभक्ति और देशद्रोह की परिभाषाएं बदलने लगीं और ‘ऊपर वाले’ अपने जोरदार, ढिंढोरेदार तर्कों से झूठ को सच साबित करने में जुटे रहे।

इधर बाबा रामदेव लाखों के सिर काटे जाने की बात कहने की हिम्मत दिखाते हैं और अब उधर शंकराचार्य जैसे झंडाबरदार उठे हैं जो अंधविश्वास फैला कर समाज को गुमराह करने की साजिश रच रहे हैं। निस्संदेह देश एक विकट दौर में से गुजर रहा है। जनमानस को नैतिक संबल की जरूरत है। शिक्षकों और बुद्धिजीवियों के साथ-साथ समाज के अन्य साधु-वृत्ति के लोग भी अपने कर्तव्यों की पहचान करते हुए, परस्पर प्रेम और सद्भावना के संदेश जन-जन तक पहुंचाने की शुरुआत करें।
’शोभना विज, पटियाला

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