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चौपालः विकास का पैमाना

विदेशी पूंजी और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों पर हमारी निर्भरता विकास का पैमाना नहीं हो सकती। यदि हम अपने अनुसंधान द्वारा किसी उत्पाद से विदेशों में सौ गुना मुनाफा कमाते हैं तो यह हुआ विकास।
Author May 12, 2017 03:45 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

विदेशी पूंजी और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों पर हमारी निर्भरता विकास का पैमाना नहीं हो सकती। यदि हम अपने अनुसंधान द्वारा किसी उत्पाद से विदेशों में सौ गुना मुनाफा कमाते हैं तो यह हुआ विकास। अपने देश में बहुत-सी योजनाएं हैं जिनमें विदेशी कर्ज की कोई आवश्यकता नहीं लेकिन फिर भी हम विदेशी सहायता लेते हैं। यह कहना कि विदेशी पूंजी के बिना आर्थिक विकास संभव नहीं है, इतिहास के प्रति अज्ञान प्रदर्शित करना है। सोवियत संघ या चीन में हुई क्रांतियों के बाद कोई विदेशी ऋण नहीं लिया गया।
जापान में विदेशी पूंजी की स्थिति नगण्य ही बताई जाती है फिर भी उसने खूब तरक्की की है। जापान में राष्ट्रीय भावना कूट-कूट कर भरी है और वहां हर कार्य राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा हुआ है। वहां मालिक, मजदूर, इंजीनियर सब एक साथ बैठ कर बड़ी-बड़ी समस्याओं का हल निकाल लेते हैं। जो कारखाना चार साल में लगना होता है वह तीन साल में उत्पादन भी देने लगता है। हमारे देश में प्रचुर संसाधन, दक्ष कारीगरों का एक सशक्त दल होने के बावजूद हम पिछड़े हुए हैं। हमारे संस्थान समय के अनुसार अपने आप को बदलने में असमर्थ हैं। उद्योग लगाने, नई तकनीक विकसित करके उसे विदेशी बाजारों में बेचने की ओर हमारा ध्यान नहीं है। उद्योगपतियों से पूछा जाना चाहिए कि क्यों उन्हें अपने उत्पाद विदेशी बाजारों में बेचने में डर लगता है?
भारत की कमजोरी यह है कि यहां हर काम करवाने की लंबी प्रक्रिया है। हर जगह रिश्वत का बाजार गर्म है। कैसे आज के काम को कल पर टाला जाए, कैसे लोगों को डरा कर, थका कर उनसे धनउगाही की जाए, इसमें हमें महारत प्राप्त है। उद्योग लगा भी लो तो महीने में बीस दिन एक इंस्पेक्टर रिश्वत लेने के लिए खड़ा हो जाता है। इनसे निपटें तो क्षेत्रीय गुंडों को महीना देना पड़ता है। उनके बाद कोई उनसे भी बड़ा माफिया अपहरण की धमकी देकर करोड़ों की मांग कर बैठता है। क्या ऐसे परिदृश्य में वास्तविक विकास की अवधारणा फलीभूत हो सकती है?
’आनंद मोहन भटनागर, लखनऊ

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