ताज़ा खबर
 

फासीवाद की जड़ें

फासीवाद दरअसल एक विशेष प्रणाली है जो प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बीच यूरोप, जापान आदि में प्रचलित हुई थी। इसमें व्यक्ति के ऊपर राष्ट्र को प्रधान माना जाता है। राष्ट्र के उत्थान में अगर व्यक्ति या व्यक्ति-समूह रुकावट बनते हैं तो उनका उन्मूलन कर दिया जाता है।
Author June 29, 2017 05:39 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटो)

अक्सर कई राजनेता वर्तमान भाजपा सरकार पर फासीवादी होने का आरोप लगाते रहते हैं। फासीवाद दरअसल एक विशेष प्रणाली है जो प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बीच यूरोप, जापान आदि में प्रचलित हुई थी। इसमें व्यक्ति के ऊपर राष्ट्र को प्रधान माना जाता है। राष्ट्र के उत्थान में अगर व्यक्ति या व्यक्ति-समूह रुकावट बनते हैं तो उनका उन्मूलन कर दिया जाता है। इसके पीछे यह विचार है कि राष्ट्र स्वयं एक जीवित अवधारणा है और लोगों का कर्तव्य है कि वे राष्ट्र के विकास में योगदान करें। राष्ट्र की यह परिभाषा अठारहवीं सदी से यूरोप में प्रचलित हुई थी जिसमें एक तरह की भाषा, नस्ल, जातीयता आदि के आधार पर राष्ट्र-राज्यों का निर्माण हुआ था। यहां काबिले-गौर है कि भारत राष्ट्र की इस पश्चिमी परिभाषा में उपयुक्त नहीं बैठता है। फासीवाद में एक व्यक्ति और एक पार्टी के शासन की प्रधानता होती है। जैसे जर्मनी में हिटलर और नाजी पार्टी, इटली में मुसोलिनी और फासी पार्टी, जापान में तोजो, स्पेन में फ्रांको आदि। ये लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में प्रवेश करने का ढोंग करते हैं और फिर सत्ता में निरंकुशता का प्रवेश हो जाता है। इस सत्ता को मजबूत बनाने के लिए उद्दंड प्रचारक (जैसे नाजी दल) होते हैं और स्वघोषित पुलिस तंत्र होता है जो सरकारी सेना और पुलिस से भी ज्यादा प्रभावी हो जाता है। ये उद्दंड प्रचारक लोगों के मन में सत्ता और राष्ट्र के प्रति सम्मान का निर्माण बलपूर्वक करते हैं और विरोधियों का उन्मूलन करते रहते हैं।

इस तंत्र में सांस्कृतिक अलगाव और हिंसा को स्थापित किया जाता है। यह अलगाव नस्ल, जातीयता, राष्ट्रीयता आदि के आधार पर किया जाता है। इसका स्पष्ट उदाहरण है- जर्मनी जर्मनों के लिए का नारा, जर्मनी को यहूदियों से मुक्त करना, इटली में मुसोलिनी द्वारा प्राचीन रोम के सर्वसत्तावाद की स्थापना, उग्र राष्ट्रवाद आदि। इस दौरान हमेशा युद्ध का माहौल बना रहता है। मुसोलिनी ने तो यहां तक कहा था कि युद्ध ही वास्तविक है और शांति का मतलब है अगले युद्ध की तैयारी। यानी जीवन एक स्थायी युद्ध है और राष्ट्र का हर नागरिक सैनिक। उत्पादन तंत्र में युद्ध की जरूरत की वस्तुओं की अधिकता हो जाती हैफासीवादी अर्थतंत्र भी कुछ अलग-सा होता है। इसमें उन पूंजीपतियों की प्रधानता हो जाती है जो राष्ट्र की जरूरत के मुताबिक उत्पादन करते हैं। राज्य खुद उत्पादन नहीं करता बल्कि निर्देश देता है। इस दौरान भी राष्ट्र को सर्वप्रमुख माना जाता है और उसी के अनुरूप उत्पादन तंत्र बना दिया जाता है। उन पूंजीपतियों को खुली छूट मिल जाती है जो शासक और पार्टी के अनुरूप कार्य करते हैं। नतीजतन, श्रमजीवियों की हालत समय के साथ खराब हो जाती है। शासन तंत्र अपने भाषणों के जरिए कोशिश करता है कि पूंजीपति और श्रमिक में मेलभाव बना रहे क्योंकि उन्हें समाजवादियों से मुकाबला करने की जरूरत रहती है।

इसके बरक्स आज के भाजपा शासन को देखें तो कई समानताएं नजर आएंगी। जैसे- राष्ट्र के ऊपर व्यक्ति का महत्त्व गौण हो रहा है, एक व्यक्ति के नाम पर पार्टी का पूरे देश में चुनाव लड़ना, बजरंग-दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, गोरक्षक दल आदि का बढ़ता महत्त्व, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की बढ़ती घटनाएं और यहां तक कि कुछ नेताओं द्वारा कथित ‘देशद्रोहियों’ को पाकिस्तान भेज दिए जाने का संकल्प दुहराना और पाकिस्तान के साथ युद्ध का माहौल बनाना। मौजूदा सरकार की आर्थिक नीतियां भी बहुत हद तक पूंजीपतियों के पक्ष में नजर आ रही हैं। इससे खुद निर्णय लिया जा सकता है कि वर्तमान सरकार फासीवादी है या नहीं।
’रामकृष्ण, मोतिहारी, बिहार
कश्मीर में हिंसा
कश्मीर में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। क्या कश्मीर फिर नब्बे के दशक के हिंसक दौर में लौट रहा है? फिर से वही सब दोहराया जाएगा? डीएसपी अयूब पंडित की बर्बर हत्या के बाद भी सरकार की तरफ से कोई सख्त कदम उठता नहीं नजर आ रहा है। सिर्फ श्रद्धांजलि देने या फूल चढ़ाने से कुछ नहीं होता है। अगर हम सोचते हैं कि हिंसा का कारण खत्म हो जाने पर हिंसा खत्म हो जाएगी तो यह खामखयाली लगता है। इस हिंसा के पीछे निश्चित ही गहरे स्वार्थ पल रहे हैं। आखिर भीड़ को बढ़ावा कौन दे रहा है?
’शिल्पा कुमारी, दिल्ली विश्वविद्यालय

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग