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दुराग्रह से दूर

रोहित की खुदकुशी प्रकरण में जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग और छात्रों का आक्रोश स्वाभाविक व जायज है। खेद है कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे स्वामी जैसे विद्वान व्यक्ति छात्रों को नक्सली कह कर मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश कर रहे हैं।
Author नई दिल्ली | January 20, 2016 21:53 pm
नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आइसा कार्यकर्ता दलित रिसर्च वेमुला रोहित की आत्महत्या के विरोध में केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री बंडारू दत्तात्रेय का पुतला जलाते हुए। (पीटीआई फोटो)

समाज में जब कुछ घटित होता है या सरकार के स्तर पर कोई नीतिगत निर्णय लिया जाता है तब स्वाभाविक तौर पर उसके पक्ष और विपक्ष में बयान आते हैं। अक्सर देखा गया है कि ये बयान एक जैसे होते हैं पर बयान देने वाला पक्ष सत्ता या विपक्ष की अपनी स्थिति के अनुसार पाला बदल लेता है। किसानों की आत्महत्याओं, छात्रों की खुदकुशी, आतंकी गतिविधियों, सांप्रदायिक वैमनस्य की घटनाओं, नीतिगत घोषणाओं और वार्षिक बजट आदि के अवसर पर विभिन्न पक्षों के बयानों को सामने रखें तो इस बात की पुष्टि होती है।

किसी भी व्यक्ति के बयान में अपने पक्ष या विचारधारा के आग्रह या पूर्वाग्रह को एक बार स्वीकारा जा सकता है पर वैचारिक दुराग्रह को किसी भी स्थिति में नकारना और अस्वीकार करना चाहिए। वैचारिक दुराग्रह को निरुत्साहित करने और प्रभावी अंकुश लगाने की जिम्मेदारी उनके संबंधित संगठनों को ही उठानी होगी, स्थापित नेतृत्व को आत्मसंयम अपनाना होगा और मीडिया को ऐसे बयानों को महत्त्व न देने की नीति अपनानी होगी।

हमारे इतने विशाल देश में मुट्ठीभर बयानवीर हैं जो गाहे-बगाहे दुराग्रहपूर्ण और अशालीन भाषा में बयान जारी कर वातावरण को दूषित करते रहते हैं। इन पर शासन/ प्रशासन की चुप्पी या निष्क्रियता घातक सिद्ध हो सकती है। हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमूला की खुदकुशी की मामले में ही यदि सुब्रहमण्यम स्वामी के बयान को देखें तो उनका वैचारिक दुराग्रह स्पष्ट दिखाई देता है। रोहित की खुदकुशी प्रकरण में जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग और छात्रों का आक्रोश स्वाभाविक व जायज है। खेद है कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे स्वामी जैसे विद्वान व्यक्ति छात्रों को नक्सली कह कर मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश कर रहे हैं। पहले भी वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को नक्सलियों का अड्डा बता चुके हैं। स्वामीजी शीतयुद्ध के समय अपने विरोधी को सीआइए या केजीबी का एजेंट कहने की नीति पर ही चल रहे हैं।

रोहित वेमूला की खुदकुशी के मामले में निष्पक्ष जांच तय समयसीमा में करके दोषियों को दंडित करना चाहिए। समाज में स्वस्थ वैचारिक बहस की स्थिति बना कर समस्याओं का निदान किया जा सकता है, वैचारिक दुराग्रह वातावरण को और दूषित करेगा। (सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर)

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कब तक
ऑस्ट्रेलिया दौरे पर गई भारतीय क्रिकेट टीम लगातार मैच हारने से सदमे में है। इसमें दो राय नहीं कि मैच हारने में सबसे बड़ी भूमिका गेंदबाजों ने ही निभाई। कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने भी इस बात को स्वीकार कर लिया है कि गेंदबाजों के लचर खेल के कारण ही भारत को ऑस्ट्रेलिया में लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है।

बल्लेबाजों का प्रदर्शन बेशक प्रशंसनीय रहा, पर केवल बल्लेबाज पूरा मैच नहीं जिता सकते और इसी बात को ध्यान में रख कर गेंदबाजों को प्रदर्शन करना होगा। टेस्ट मैचों से कप्तानी छोड़ने के बाद अब धोनी की एकदिवसीय मौचों की कप्तानी पर भी गाज गिरना तय है।

सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या अब भारतीय क्रिकेट की दहाड़ सिर्फ स्वदेश में सिमट कर रह गई है? विदेशी पिचों पर भारत की हार का सिलसिला कब तक चलता रहेगा? (सुनील चौरसिया, हरकेश नगर, नई दिल्ली)

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बदहाल अन्नदाता
हमारे देश में प्राकृतिक आपदाएं हर साल फसल को बरबाद करती हैं। कभी अनावृष्टि तो कभी अतिवृष्टि के रूप में। मुआवजे और राहत के नाम पर हकीकत से ज्यादा सियासत दिखाई देती है। सरकारी योजनाएं और राहत कार्य किसान तक पहुंचते ही नहीं हैं। ऐसे में आवश्यक है कि गांवों में सिंचाई की सुविधाओं के साथ-साथ लघु उद्योगों को भी बढ़ावा दिया जाए ताकि किसान अपनी आजीविका तो प्राप्त कर सकें।

कृषि संबंधी समस्याएं केवल कृषक की नहीं बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र की हैं। ऐसे में सरकार का दायित्व है कि अन्नदाता के आंसू रोकने के लिए जल्द से जल्द कोई ठोस कदम उठाए। (लोकेश सिंह, खंडवा)

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समान नियम
सरकार सड़क पर हर दुपहिया वाहन चालक और उसके पीछे बैठी सवारी को हेलमेट पहनने का आदेश देती है। इस आदेश का पालन न होने पर जुर्माना किया जाता है जबकि इस मामले में सरकार को सिर्फ सुझाव देना चाहिए। दूसरी तरफ अखबारों में अक्सर यात्रियों से भरी नौकाओं के चित्र छपते हैं जिनमें नाविक या यात्रियों ने कोई लाइफ जैकेट नहीं पहनी होती है। किसी नदी में कोई नाव डूब जाती है तो बहुधा यात्रियों के शवों का भी पता नहीं चलता। लिहाजा, हेलमेट की तर्ज पर हर नाव के नाविक और यात्रियों के लिए लाइफ जैकेट पहने रहने का आदेश सरकार फौरन जारी करे। किसी नाविक या सवारी के बिना लाइफ जैकेट पहने पाए जाने पर भारी जुर्माना होना चाहिए। बहुत से अनुभवी मछुआरे बिना लाइफ जैकेट के समुद्र में रोज मछलियां पकड़ने जाते हैं। निजी सुरक्षा के नियम हर जगह एक समान लागू होने चाहिए। (जीवन मित्तल, मोती नगर, दिल्ली)

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मजबूरी के मंदिर
निस्संदेह आज अध्यापन का उद्देश्य एक अदद नौकरी हासिल करना हो गया है। सरकारी शिक्षा का आज जो बुरा हाल है उसकी जवाबदेही कुछ तो हमारे इन ज्ञान-गुरुओं की भी बनती है। पिछले कई सालों से सरकारी शिक्षा की विफलता का ठीकरा केवल स्कूलों में बुनियादों सुविधाओं की कमी पर फोड़ा जाता रहा है। राज्यों के स्कूलों की बात छोड़ें, राजधानी के सरकारी स्कूलों की शिक्षा भी बीमार होती जा रही है। इसके सुधार के लिए हमारे अध्यापकों ने क्या कभी कोई गंभीर कदम उठाया है?
आज सभी सरकारी अध्यापक अच्छा वेतन ले रहे हैं, और यदि अपवाद को छोड़ दें, तो इनके बच्चे पब्लिक स्कूलों में पढ़ रहे हैं। लेकिन दुख की बात है कि अपने कर्तव्य को ये गंभीरता से

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क्यों नहीं ले रहे हैं?
यह सर्वविदित है कि सरकारी स्कूलों में गरीब वर्ग का एक बड़ा तबका पढ़ता है। क्या उनके अध्यापकों का दायित्व नहीं है कि इन बच्चों को भी पब्लिक स्कूली बच्चों के समांतर खड़ा करें? लेकिन बड़े दुख की बात है कि हमारे सरकारी स्कूल मजबूरी के मंदिर बनते जा रहे हैं। हमारा शिक्षा विभाग भी सरकारी शिक्षा के प्रति सालों से उदासीन है। इसलिए सरकार का कर्तव्य है कि वह बेहतर शिक्षा के लिए उचित कदम उठाए। (रमेश शर्मा, केशव पुरम, दिल्ली)

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