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विकास का सच

आजादी के सात दशक बाद भी देश की 6.5 करोड़ आबादी मलिन बस्तियों में नारकीय जीवन जीने को मजबूर है।
Author May 10, 2017 05:18 am
पीएम ने कहा यहां के लोगों को विकास एवं रोजगार के असीमित साधन उपलब्ध हो सकेंगे।

कहां तो तय था चरागां हरेक घर के लिए/ कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए/ यहां दरखतों के साये में धूप लगती है/ चलो यहां से चलें उम्र भर के लिए। दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां स्वतंत्रता के बाद हुए विकास की हकीकत बयां करती हैं। विडंबना है कि आजादी के सात दशक बाद भी देश की 6.5 करोड़ आबादी मलिन बस्तियों में नारकीय जीवन जीने को मजबूर है। इन बस्तियों में न तो पानी का समुचित प्रबंध है और न आवास की संतोषजनक व्यवस्था। शहर भर की गंदगी और कूड़े की बीच मलिन बस्तियों में गरीब निचले कहे जाने वाले तबके के लोग घुट-घुट कर मरने को विवश हैं। एक ओर सरकार स्मार्ट सिटी का सुनहरा स्वप्न बुन रही है तो वहीं दूसरी ओर मलिन बस्तियां स्मार्ट सिटी की पोल खोल रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक 1981 में इन बस्तियों में रहने वाले लोगों की संख्या 2.79 करोड़ थी जो 2011 में बढ़कर 6.5 करोड़ हो गई। यानी समय और जनसंख्या की वृद्धि के साथ मलिन बस्तियों की आबादी में भी इजाफा हुआ है। 1952 में मलिन बस्तियों के विषम हालात देख कर प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इन्हें नरक कुंड की संज्ञा दी थी।

अनेक विद्वानों ने इस क्षेत्र को शहर का कैंसर और पत्थर का रेगिस्तान जैसे नामों से परिभाषित किया है। इसे व्याधि का नगर भी कहा जाता है। मसानी के शब्दों में विश्व की रचना ईश्वर ने की है, नगरों की मानव ने और मलिन बस्तियों की रचना शैतानों ने की है। इन बस्तियों को मुंबई में चाल, दिल्ली में कटरा, कोलकाता में बस्ती, चेन्नई में चेरी और कानपुर में अहाते आदि नामों से जाना जाता है। इन बस्तियों की ओर आकर्षित करने वाले अनेक कारण हैं जिनमें औद्योगीकरण और रोजगार प्रमुख हैं। हर वर्ष लाखों लोग गांवों से शहरों की ओर रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं। उद्योग-धंधों के कारण शहरों की आबादी में हर साल भारी इजाफा होता है। यही कारण है कि गांव की सुविधाहीन जीवनशैली से तंग आकर और बेहतर जीवन के विकल्पों की खोज ग्रामीणों को शहर का रास्ता दिखाती है। वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक आपदाएं भी लोगों को अपने मूल स्थान से खदेड़ कर शहरों की ओर धकेल देती हैं।

शहर की क्षमता से अधिक आबादी का बोझ और आवास की समस्याएं संयुक्त रूप से इन गैर कानूनी मलिन बस्तियों को जन्म देती हैं। इन बस्तियों में शिक्षा की व्यवस्था न होने के कारण गलत संगत के शिकार बच्चे छोटी उम्र में ही बाल मजदूर और समाज की नजरों में अपराधी बन जाते हैं। अनेक औरतें वेश्यावृत्ति के धंधे से भी जुड़ जाती है। लड़ाई, झगड़े और शराब पीकर गाली-गलौच की घटनाएं इन बस्तियों में प्राय: देखने को मिलती हैं। शहरीकरण के साथ इन बस्तियों का समाधान खोजना आज विकासशील भारत के सामने बड़ी चुनौती है। किसी स्थान या शहर विशेष में रोजगार के अवसरों की उपलब्धता घटा कर उन अवसरों का विकेंद्रीकरण करना एक समाधान हो सकता है। गांवों को यदि सारी सुविधाएं- रोजगार, शिक्षा, पेयजल, बिजली, आवास आदि दी जाएं तो कोई आखिर क्यों शहरों की ओर पलायन करेगा? हमें शहरों को स्मार्ट बनाने के साथ गांवों को भी स्मार्ट बनाने पर जोर देना होगा। साथ ही राष्ट्रीय योजना में आवास व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। मलिन बस्तियों की समस्याओं से छुटकारा पाए बिना प्रगति की हर मंजिल खोखली है।
ह्णदेवेंद्रराज सुथार, बागरा, जालोर

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