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चौपालः लेखक बनाम पाठक

‘किताबों की आभासी दुनिया’ (दुनिया मेरे आगे, 29 जनवरी) में वीरेंद्र जैन जी की चिंता जायज है। भारतीय भाषाओं में छपी पुस्तकों के लिए वास्तव में यह कठिन दौर है।
Author February 5, 2016 02:49 am
(Image-aalley.com)

‘किताबों की आभासी दुनिया’ (दुनिया मेरे आगे, 29 जनवरी) में वीरेंद्र जैन जी की चिंता जायज है। भारतीय भाषाओं में छपी पुस्तकों के लिए वास्तव में यह कठिन दौर है। हालांकि अच्छा दौर कौन-सा था, यह शोध का विषय है। लेखक बढ़ रहे हैं, पाठक कम हो रहे हैं, यह चिंता की बात नहीं है। जो पढ़ेगा, वह कलम भी चलाएगा।

सबसे पहले हमें आश्वस्त होना होगा कि पढ़ने वाले बहुत हैं। चिंता इस बात को लेकर है कि अच्छी और सुंदर पुस्तकें उन तक पहुंच नहीं पा रहीं। सस्ती पुस्तकों के नाम पर ऐसी पुस्तकें उन तक पहुंचाई जा रही हैं, जिन्हें पढ़ते-पढ़ते पाठक की आंखों से पानी बहने लगता है। छोटे शहरों में पुस्तक मेलों के नाम पर टोने-टोटके और राशिफल बेचे जा रहे है। ऐसे लेखक जिनसे सामान्य पाठक परिचित हैं, वे अपने दुर्ग से निकलने को तैयार नहीं। उनका लिखा छप रहा है और उन्हें क्या चाहिए!

आज सोशल मीडिया के समय में भी कितने लेखक हैंं जो ज्यादा से ज्यादा अपने पाठकों से संवाद स्थापित करने के प्रयास में लगे हैं? पाठक भटक रहा है, लेकिन उसे दिल्ली का रास्ता दिखा दिया जाता है। यह कहां तक उचित है? एक फिल्म के प्रचार के लिए पूरी टीम दिन-रात लगी रहती है। कितने ही आलोचक उसे स्टार देने में लगे रहते हैं। क्या किसी पुस्तक के बारे में कभी बताया जाता है कि इसे क्यों पढ़ना चाहिए? क्या यह पाठक का हक नहीं है? सभी चाहते हैं कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की पुस्तकें खूब बिकें, लेकिन इसके लिए सभी को मिल कर प्रयास करने होंगे। अन्यथा किताबों की दुनिया आभासी ही बनी रहेगी। ’रवींद्र कुमार, कैथल, हरियाणा 
आतंक का सिरा
सर्व-कुख्यात आतंकी संगठन आइएसआइएस का अमानवीयता से भरपूर खूनी खेल, उसकी अकथनीय नृशंसता, बर्बरता आदि का विवरण अक्सर हर टीवी चैनल आए दिन दिखाता रहता है। इस आतंकी संगठन के पास आधुनिकतम हथियार, संचार माध्यमों के नवीनतम संसाधन या उपकरण आदि सब कुछ हैं। मन में सहसा यह सवाल उठता है कि इस संगठन को ये सब अकूत सामरिक संसाधन कौन पहुंचाता है?
कौन-से ऐसे देश हैं जो इस मामले में इस संगठन की मदद करते हैं?हथियारों का ऐसा कितना बड़ा जखीरा इस संगठन के पास है जो खत्म ही नहीं हो रहा! इस तथ्य का उद्घाटन कोई भी चैनल नहीं करता है, बस वीडियो क्लिप दिखाता है और सूचनाओं का चित्रात्मक वर्णन करता है। जब तक आइएसआइएस को हथियारों की सप्लाई बंद नहीं होती, दुनिया में आतंक बंद नहीं होगा। विश्व में जब तक गुप्त रूप से हथियारों, गोला-बारूद आदि की खरीद-फरोख्त पर अंकुश नहीं लगता, तब तक आतंक का वजूद बना रहेगा। आतंक ‘बंदूक’ का पर्याय ही तो है। बंदूक नहीं तो आतंक भी नहीं।
’शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

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