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आहार पर सियासत

मांसाहार-शाकाहार पर सियासत और मानवाधिकार का बहाना, राजनीति किसी भी विषय को कब कैसे रंग दे, नहीं मालूम। मांसाहार के नाम पर कुछ ऐसा हो रहा है..
Author September 14, 2015 10:33 am

मांसाहार-शाकाहार पर सियासत और मानवाधिकार का बहाना, राजनीति किसी भी विषय को कब कैसे रंग दे, नहीं मालूम। मांसाहार के नाम पर कुछ ऐसा हो रहा है। विषय तो स्वविवेक का है, लेकिन धर्म से जोड़ कर हल्ला मचाने का जरिया जरूर है इन दिनों। यह भी सही, किसी भी स्थान का भोजन वहां की भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर होता है।

अब समुद्र तट के लोग मछली, झींगा छोड़ हर रोज शाक-भाजी तो नहीं खाएंगे। सच तो यह है कि मांसाहार किसी धर्म और जाति का मामला है ही नहीं, इसे जोड़ना भी नहीं चाहिए। कई जातियों या धर्मों में तो पूजा-पाठ के बाद पशुबलि और शराब के प्रसाद चढ़ाने का चलन है तो इसे क्या कहेंगे? कई जाति के लोग मांसाहारी वर्ग के बावजूद प्याज-लहसुन तक नहीं खाते।

हिंदू, जैन को तो छोड़िए, मुसलमानों की भी बड़ी संख्या है, जो अंडा तो दूर प्याज-लहसुन तक नहीं खाते, यानी विशुद्ध शाकाहारी। क्या खाने और न खाने के विषय अब अदालतें तय करेंगी। एक ओर विकासशील देश होने और दुनिया का सिरमौर बनने की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर आहार को लेकर बहस में समय गंवाते हैं? आचार-विचार की सोचते तक नहीं। लगता नहीं कि यह विषय गौण है, अहम अमन और तरक्की की बात हो।

जैन धर्म के पर्यूषण पर्व के चलते मुंबई में मांस की बिक्री पर एक दिन, गुजरात, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में तीन अलग-अलग दिनों के लिए रोक लगाई गई है जिसको लेकर खूब बवाल हो रहा है। एक हकीकत यह भी जो स्वयं स्वीकार्य परंपरा है, सावन के पूरे महीने महाराष्ट्र में हिंदू धर्मावलंबी मांस नहीं खाते। बहुत लोग हैं, जो सोमवार, मंगलवार, गुरुवार या विभिन्न पर्व-तिथियों पर मांस नहीं खाते, कुछ तो सप्ताह में एक दिन नमक से भी परहेज करते हैं। इसके पीछे धार्मिक कारण भले ही गिनाए जाएं। लेकिन स्वास्थ्य संबंधी वैज्ञानिक आधार भी एक हकीकत है।
सच यह भी है कि राजनीति और धर्म एक-दूसरे से अछूते नहीं हैं। लेकिन खानपान को लेकर राज्य का हस्तक्षेप भी ठीक नहीं। लगता नहीं कि हस्तक्षेप कर मामला उलझाने जैसा बना दिया गया है? पर्व, तीज, त्योहार हर वर्ष आते हैं, आते भी रहेंगे। लेकिन उनको लेकर मांस पर प्रतिबंधों की हिदायतें क्या सही हैं? विषय वाद-विवाद का नहीं, पर बना जरूर दिया गया। कभी गोमांस को लेकर बेवजह के बयान सामने आते हैं तो अब पर्वों के नाम, मांस बिक्री का सरकारी प्रतिबंध, कितना न्यायोचित लगता है यह सब।

देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों, कस्बों यहां तक कि गांवों में भी मांस-मदिरा की दुकाने देवालयों के पास या भीड़ भरे आम रास्तों पर हर रोज स्थायी रूप से लगती हैं, स्पष्ट कानून के बावजूद सड़कों और बीच बाजार में खुले में मांस बिकता है। क्या दो या तीन दिन के प्रतिबंध से सब ठीक हो जाएगा? फिर ऐसा कुछ हुआ क्या, जो ठीक करने की जरूरत आन पड़ी।
’ऋतुपर्ण दवे, शहडोल, मप्र

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