March 27, 2017

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चौपालः बदलाव का दौर?

स्वस्थ व खुशहाल समाज से ही देश का सर्वांगीण विकास होता है। इसके बिना न सिर्फ आर्थिक वृद्धि को धक्का लगता है बल्कि समाज में आय की असमानता की खाई भी और गहरी होती चली जाती है।

Author October 17, 2016 01:46 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

स्वस्थ व खुशहाल समाज से ही देश का सर्वांगीण विकास होता है। इसके बिना न सिर्फ आर्थिक वृद्धि को धक्का लगता है बल्कि समाज में आय की असमानता की खाई भी और गहरी होती चली जाती है। पिछले कुछ महीनों से देश की स्वास्थ्य सेवाएं चिल्ला-चिल्ला कर सरकारी तंत्र को जगा रही हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। पिछले महीने जब ओड़िशा में दाना मांझी की पत्नी की लाश को कंधे पर ले जाने की हृदयविदारक तस्वीर सामने आई तो कुछ दिनों तक देश में चर्चा हुई, सरकारी तंत्र को कोसा गया, फिर बहस कहीं गुम हो गई। चौंकाने वाली बात यह है कि उस घटना के बाद से ही ऐसी कई तसवीरें अखबार में लगातार सामने आ रही हैं। पिछले ही दिनों उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में 94 वर्षीय पिता की लाश को कंधे पर ले जाने की तस्वीर सामने आई।
सवाल है कि पिछले कुछ महीनों से ही क्यों इस तरह की तस्वीरें लगातार छप रही हैं? क्या दाना मांझी वाली घटना से पहले हमारा सरकारी स्वास्थ्य तंत्र सुचारु रूप से चल रहा था? क्या हमारा मीडिया विकेंद्रीकरण की राह पर चल पड़ा है? क्या मीडिया में अब जमीनी समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर दिखाने का नया ट्रेंड चल पड़ा है? या मीडिया का राजनीतिकरण किया जा रहा है? उपर्युक्त तमाम सवालों पर देश के बुद्धिजीवियों और वर्तमान समाज तथा सरकार को गहराई से सोचना चाहिए।

क्योंकि भारत बहुत बड़े आर्थिक और सामाजिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में अगर हम दोनों में संतुलन स्थापित नहीं कर पाएंगे तो इसके बहुत ही गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। सरकार को यह याद रखना चाहिए कि 2014 के चुनाव में जो वादे किए थे अगर उन्हें पूरा करने में ज्यादा देरी हुई तो जनता वोट की चोट से अपना नसीब खुद लिखना जानती है। बेशक सरकार ने पिछले ढाई साल में बुनियादी ढांचे का विकास, सामाजिक जागरूकता, निवेश के अनुकूल नियामकीय ढांचे का निर्माण, आॅनलाइन तंत्र का जाल फैलाना, और जनकल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से जमीनी हकीकत में बदलाव लाने की कोशिश की है, जो सराहनीय है, लेकिन अब उसका असर दिखना चाहिए जो नजर नहीं आ रहा है। रोजगार-सृजन के ताजा आंकड़े कहते हैं कि पिछले पांच साल में रोजगार की दर सबसे न्यूनतम स्तर पर है, जो कि चिंता का विषय है। वहीं दूसरी ओर सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत दयनीय है।

मेरी राय में सरकार ने अब तक लगभग सभी क्षेत्रों में जो भी काम किया है अब उसे प्राथमिकता के तहत चिह्नित कर उसे कार्यान्वित करना चाहिए। मसलन, पहली श्रेणी में रोजगार और स्वाथ्य को रखना चाहिए। दूसरी श्रेणी में पुलिस सुधार और राज्य विवाद को रखना चाहिए। क्योंकि अगर हम घरेलू मोर्चे पर मजबूत रहेंगे तभी हम बाहरी समस्या मसलन आतंकवाद, बाहरी घुसपैठ, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक उथल-पुथल आदि समस्याओं से मुकाबला कर सकेंगे। इसके लिए हमें दूसरे देशों के विकास मॉडल का अध्ययन कर यहां की जरूरत के मुताबिक विकास मॉडल का चुनाव कर उसे अपनाना और लागू करना चाहिए और नीतियों को किर्यान्वित करने में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ानी चाहिए। इससे सरकार और जनता के बीच जुड़ाव रहेगा और अपनी सरकार के प्रति आक्रोश पैदा होने के बजाय विश्वास कायम होगा।
नीतीश कुमार, बेगूसराय

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First Published on October 17, 2016 1:45 am

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