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चौपालः हमारी पहचान

तवलीन सिंह का लेख ‘गोरक्षा की गाज’ (24 जुलाई ) पढ़ कर लगा कि उनकी असली चिंता गोरक्षा के नाम पर दलितों पर ढाए गए जुल्म से...
Author July 28, 2016 03:06 am
(फाइल फोटो)

तवलीन सिंह का लेख ‘गोरक्षा की गाज’ (24 जुलाई ) पढ़ कर लगा कि उनकी असली चिंता गोरक्षा के नाम पर दलितों पर ढाए गए जुल्म से अधिक तथाकथित गोरक्षकों के कुकृत्यों से मोदी सरकार की धूमिल होती छवि और इसके उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर पड़ने वाले असर को लेकर है। चलिए, किसी बहाने उन्होंने अपनी कलम से दलितों की आवाज तो उठाई!

क्या यह विमर्श का विषय नहीं है कि भारत में आजादी के सातवें दशक में भी समाज का एक वर्ग ऐसा है जिसके लोग मंदिरों में पूजा नहीं कर सकते, एक घाट पर स्नान नहीं कर सकते, कथित सवर्णों के आगे बैठ नहीं सकते। कई स्कूलों में दलितों के बच्चों की बैठने की व्यवस्था अलग होती है। लेकिन आज इन बिंदुओं के बजाय इस पर चर्चा हो रही है कि किस वर्ग को साथ रखने से कितना वोट बढ़ेगा और किसे अलग करने से घाटा होगा? तवलीनजी ने स्वीकार किया कि पिछले दो सालों में गोरक्षा दलों के अच्छे दिन आ गए। सच में ऐसा ही है। आज जो नफरत का वातावरण चारों ओर है, उसका एक कारण यह भी है। जाति प्रथा, ऊंच-नीच या अगड़े-पिछड़े के सवालों को लेकर उलझे समाज और दकियानूसी विचारों के बढ़ते प्रभाव से ही चारों तरफ अशांति और कोलाहल है।

गुजरात, कश्मीर, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि में कौन, कब और कहां किसी को कभी गोरक्षा के नाम पर, कभी गोमांस के नाम पर तो कभी देशभक्ति और राष्ट्रवाद के नाम पर किसे मौत के घाट उतार दे, कहना मुश्किल है। गुजरात में पांच दलितों को एक गाड़ी में बांध कर पीटने की घटना, महाराष्ट्र में आंबेडकर भवन गिराने का प्रयास, मायावती को भाजपा नेता द्वारा अपशब्द कहने, हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की आत्महत्या- ये सभी उदाहरण इन्हीं दो वर्षों के हैं जो सरकार की मंशा और नीति को उजागर करते हैं।

सवाल है कि आखिर इन्हीं दो सालों में इतनी उग्रता का प्रदर्शन क्यों? क्या यह देश दलितों और मुसलमानों का नहीं है? क्या आजादी दिलाने में इन समुदायों का कोई योगदान नहीं है? रोहित बेमुला से लेकर गुजरात की घटनाओं से दलित समुदायों में एक भय और गुस्सा है। यह गुस्सा नेतृत्व में बैठे लोगों को समझना होगा। समझना होगा कि किसी एक वर्ग या समुदाय से देश नहीं बनता, देश बनता है विभिन्न संस्कृतियों के, विचारों के, विभिन्न तरह के लोगों से। भारत की पहचान अनेकता में एकता की रही है। इस पहचान को बनाए रखने में ही सबकी भलाई है।
’अशोक कुमार, तेघड़ा, बेगूसराय

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