December 02, 2016

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चौपालः आयाराम गयाराम

चुनाव से पहले नेताओं का दलबदलू होना राजनीतिक गलियारों में चिंता का सबब बना जाता है जिसमें जनता इस कशमकश में रह जाती है कि हम पार्टी के साथ जाएं या अपने नेता के साथ।

Author November 4, 2016 03:05 am

चुनाव से पहले नेताओं का दलबदलू होना राजनीतिक गलियारों में चिंता का सबब बना जाता है जिसमें जनता इस कशमकश में रह जाती है कि हम पार्टी के साथ जाएं या अपने नेता के साथ। आजकल यही हालात उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद््देनजर देखने को मिल रहे हैं। तकरीबन हर पार्टी के नेताओं में एक पार्टी छोड़ कर दूसरी पार्टी में जाने की होड़-सी लगी है। बीते कुछ दिनों के भीतर ही करीब डेढ़ दर्जन से अधिक नेताओं ने अपनी वफादारियों में उलटफेर कर लिया है। हिंदी फिल्मों में विलेन का हृदय परिर्वतन होने में भी तीन घंटे लग जाते हैं लेकिन यहां कभी भी कोई कांग्रेसी भाजपायी हो जा रहा है तो समाजवादी पूंजीवादी। आज सियासत भी कॉरपोरेट घराने की तरह हो गई है जहां पैसा, पावर और पद के लिए सारे रिश्ते-नाते भुला दिए जाते हैं। उत्तर प्रदेश में सियासत जब भी तेज होती है तो पाला बदलने की खबरें भी तेज हो जाती हैं और ये सारा खेल आजकल जोरों पर है। कोई सपा छोड़ कर बसपा में जा रहा है तो कोई कांग्रेस छोड़ कर भाजपा का दामन थाम रहा है। चुनाव से पहले सब अपनी-अपनी जमीन टटोल रहे हैं, निष्ठा बदल रहे हैं। मतदाताओं को इनके बारे में ध्यान से सोचने की जरूरत है। जो कल किसी और की बुराइयां करते, कमियां निकालते नहीं थकते थे आज वे उनके साथ जीने-मरने की कसमें खा रहे हैं। ये कल किसी और पार्टी में थे आज किसी और में, परसों किसी और के साथ होंगे। ऐसे नेताओं पर आखिर कैसे भरोसा किया जा सकता है?


चुनाव नजदीक आने के साथ यह खेल नए-नए रूप और नए-नए स्वरूप में देखने को मिलेगा। देश में पाए जाने वाले तमाम मौसमों में एक चुनावी मौसम भी है जो चुनावी धोखों और बेवफाइयों के लिए जाना जाने लगा है। यूपी में भी वह मौसम आया है जिसे देखते हुए सभी पार्टियों ने चुनावी मोर्चा संभाल रखा है। कोई परिर्वतन रैली के सहारे परिर्वतन लाने की बात कर रहा है, तो कोई नए चेहरे लाकर चुनाव जीतने की तैयारी में लगा हुआ है। कोई अभी-अभी अपने पारिवारिक झगड़े से निकल कर चुनाव की तैयारियों में लगा हुआ हैं। इन सबके बीच कई नेता दलबदल करके खुद को जनता का हितैषी साबित करने में लगे हुए हैं। ऐसे नेताओं की तादाद इतनी ज्यादा है कि लगता है, इनका हिसाब-किताब रखने के लिए मोबाइल ऐप बनाना पड़ेगा ताकि ऐसे नेताओं को पकड़ा-पहचाना जा सके।
’लव कुमार, दिल्ली

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First Published on November 4, 2016 2:17 am

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