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चौपालः किसानों का कौन

व्यवस्था कितनी निष्ठुर है और लोकतंत्र मात्र दिखावा! यों तो इसके उदाहरण मोदी राज में भरे पड़े हैं पर ताजा उदाहरण तमिलनाडु के 114 किसानों के एक जत्थे का जंतर-मंतर पर 39 दिन चला धरना है।
Author April 29, 2017 03:10 am
तमिलनाडु के 114 किसानों के एक जत्थे का जंतर-मंतर पर 39 दिन चला धरना है

व्यवस्था कितनी निष्ठुर है और लोकतंत्र मात्र दिखावा! यों तो इसके उदाहरण मोदी राज में भरे पड़े हैं पर ताजा उदाहरण तमिलनाडु के 114 किसानों के एक जत्थे का जंतर-मंतर पर 39 दिन चला धरना है। 46 डिग्री तापमान में नगे बंदन झुलसाती लू और तपती सड़क पर गले में परिजनों की खोपड़ियां लटकाए किसानों ने सत्ता के गलियारे में अपनी वेदनाओं को पहुंचाने के लिए क्या-क्या जतन नहीं किया! वे तपती सड़क पर नंगे बदन लेटे, चूहे खाये, सड़क पर बिखरा भात खाया, अपना मूत्र पिया और इससे भी भयावह बात जिसे सोचकर ही मितली आ जाए, उन्होंने घोषणा कर दी कि अगले यानी 40वें दिन भी यदि सरकार ने हमारी वेदना नहीं सुनी तो अपना मल खाएंगे। यह नौबत तब आई जब 39 दिन तक भिन्न-भिन्न तरीकों से सरकार के ध्यानाकर्षण के बाद भी उन्हें लगा कि उसके बहरे कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है।

इससे बदतर और क्या होगा! बार-बार सोने की चिड़िया का राग अलापने वाले अतीत की स्मृतियों के हिमायती सनातनियों के कथित ‘रामराज’ में यह सब हो रहा है! क्या यही हैं अच्छे दिन और रामराज? विश्व में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां वेदना अभिव्यक्ति की ऐसी कोई मिसाल सामने आई हो। इतना ही नहीं, किसी ऐसे शासन की मिसाल भी देखने को नहीं मिली होगी जहां संसद के सामने उसके नागरिक अपना ही मूत्र पी रहे हों और अगले दिन मल खाने की बात कहने के लिए मजबूर कर दिए गए हों और सरकार फिर भी मौन साधे रहे। क्या यह लोकतंत्र जीवंत है? यदि संविधान लागू है तो नागरिक सम्मान कहां गया? स्वमूत्र पीने को मजबूर हुए किसानों के नागरिक सम्मान का क्या हनन नहीं हुआ? कथित गोरक्षकों के हाथों शिकार हुए गोपालक पहलू खां का जीने का अधिकार कहां गया?

मल खाने के ऐलान के बावजूद केंद्र सरकार में कोई हलचल नहीं देखी गई। जग निंदा के पात्र बनने के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री आए और उनकी समस्याओं के हल का आश्वासन दिया। उनके आश्वासन पर किसानों ने 25 मई तक के लिए अपना आंदोलन स्थगित कर दिया है। कैसी विडंबना है कि एक तरफ तो हम विश्व में सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करते हैं और दूसरी तरफ सरकार का इतना निष्ठुर रवैया! हर खबर पर, हर पल स्वयं निगाह रखने और ‘मन की बात’ करने वाले प्रधानमंत्री के मन में इन किसानों के प्रति वेदना अभिव्यक्ति के ऐसे मितली भरे हालात देखकर भी कोई संवेदना नहीं जगी! पूंजीवादी पिशाचों को यह भले न दिखे पर क्या संयुक्त राष्ट्र के लिए भी ये घटनाएं विचलित करने वाली नहीं हैं? मन को कचोटने और मितली लाने वाले इस घटनाक्रम के बीच हम तो मुरीद हो गए इन किसानों के जुझारू हौसले के। अपनी वेदना और दर्द लिए क्या-क्या नहीं सहा! इनमें कई बीमार हो गए पर डटे रहे। न वे हारे और न उनके संकल्प।
’रामचंद्र शर्मा, जयपुर

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  1. N
    Narendra Batra
    May 1, 2017 at 1:33 pm
    sun dogle midia house wo sab paisa lekar dharna kar rahe the aur 5 aur 7 star hotolo se khana bulwate the bislari se kam pani nahi peete the jaise hi MCD ka chunav hua ye sab plen se chennai ke liye ud e agar ye gareeb hai to bhagwab sabko aisa gareeb banaye jinke paad aodi jaisr kare ho aur deshdrohi samrthan karne wale dogle suwar neta aur midia house ho
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