ताज़ा खबर
 

चौपालः पहुंच का संकट

आजकल न केवल हिंदुस्तान बल्कि पूरे विश्व में चल रही धार्मिक और नस्लीय असहिष्णुता के बीच बरबस ही ब्रूनो की याद आती है जिसने अपने समय के पुरातन पंथियों से लोहा लिया था और इस वजह से उसे जिंदा जला दिया गया था।
Author March 17, 2017 03:02 am
असम की एक किशोर गायिका नाहिदा आफरीन के खिलाफ लगभग पचास मुसलिम धर्मगुरुओं ने फतवा जारी किया।

आजकल न केवल हिंदुस्तान बल्कि पूरे विश्व में चल रही धार्मिक और नस्लीय असहिष्णुता के बीच बरबस ही ब्रूनो की याद आती है जिसने अपने समय के पुरातन पंथियों से लोहा लिया था और इस वजह से उसे जिंदा जला दिया गया था। ब्रूनो की ही तरह विश्वभर में कई नाम हैं जो रूढ़िवादियों के खिलाफ जंग छेड़ते थे। भारत में भी कबीर, नानक, राम मोहन राय आदि प्रमुख रहे। अभी हाल में असम की एक किशोर गायिका नाहिदा आफरीन के खिलाफ लगभग पचास मुसलिम धर्मगुरुओं ने फतवा जारी किया। समय-समय पर कई अन्य प्रगतिशील मुसलिम विचारकों पर भी फतवे जारी किए गए हैं। अब प्रश्न है कि इन फतवों का आधार क्या होता है? और एक ही उत्तर प्राप्त होता है- ‘शरिया’। शरिया वस्तुत: इस्लामिक कानूनों की एक पुस्तक है और जानकार बताते हैं कि इसका आधार कुरआन और हदीस हैं। कोई भी रचना अपने देश, काल और परिस्थिति से प्रभावित होती है। कुरआन, हदीस, शरिया भी अपवाद नहीं हैं।

न केवल इस्लामी धर्मग्रंथ बल्कि अन्य धर्मों के ग्रंथ के लिए भी समान रूप से सत्य है। चाहे वे वेद-पुराण हों, बाइबिल हो, जेंदा-वेस्ता हो या कुछ और। इतिहास गवाह है कि जब भी धर्म ने (या यों कहें कि धर्म के ठेकेदारों ने) अप्राकृतिक मुद्दों को प्रभावी बनाने की कोशिश की है तब लोगों का एक वर्ग विरोध करता आया है। जैसे, भारत में छठी शताब्दी ईसा पूर्व का नास्तिक आंदोलन, मध्यकालीन भक्ति आंदोलन, यूरोप का पुनर्जागरण और प्रबोधन और उसका वैश्विक विस्तार आदि-आदि। इक्कीसवीं सदी में आकर भी फतवा या राम-मंदिर जैसे मुद्दे और उन पर बहस इस बात के द्योतक हैं कि हम और हमारा समाज अब भी पुस्तकों से आजाद नहीं हो पाए हैं जो कि हमें पीछे खींचने की कोशिश करती हैं। यूरोपीय पुनर्जागरण और प्रबोधन ने मानववाद, तर्कबुद्धिवाद, इहलौकिकता आदि की शिक्षा प्रदान की थी लेकिन वर्तमान समाज का एक बड़ा वर्ग उसे अब भूल रहा है। समाज फिर से उन पुस्तकों में कैद हो जाना चाहता है जो तर्क की जगह रूढ़ि को प्रश्रय देती हैं।

लिहाजा, एक ऐसा माहौल बन रहा है जिसमें जरूरत है कि फिर एक प्रबोधन-युक्त आंदोलन हो। हर बार की तरह इस बार भी इसका नेतृत्व बुद्धिजीवी करेंगे और नस्लीय, धार्मिक, जातिगत असमानताओं को समाप्त करने की कोशिश करेंगे। हमें समझना होगा कि हर मानव समान है। चाहे वह हिंदू हो, मुसलिम हो, सिख हो या ईसाई हो; चाहे गोरा हो या काला हो; पुरुष हो या स्त्री हो; दलित हो या कथित उच्च जाति का हो; चाहे अमेरिकी हो या मेक्स्सिकन या कुछ और हो। अंतर बस एक है और वह है- ‘संसाधनों पर पहुंच का’। पहुंच के इस संकट को शीघ्रातिशीघ्र समाप्त करना होगा क्योंकि सभी तरह की असमानताओं का मूल यही है।
’कुमार ऋषिराज, आशियाना नगर, पटना

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.