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चौपालः न्याय का सवाल

सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस कर्णन के मामले में एक के बाद एक जिस तरह के कदम उठाए हैं वे न तो न्यायोचित प्रतीत होते हैं और न ही संविधान-सम्मत।
Author May 13, 2017 02:19 am
न्यायमूर्ति कर्णन ने कहा कि मेरा पक्ष सुने बिना ही मेरा काम मुझसे ले लिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस कर्णन के मामले में एक के बाद एक जिस तरह के कदम उठाए हैं वे न तो न्यायोचित प्रतीत होते हैं और न ही संविधान-सम्मत। न्याय-शास्त्र का एक निर्विवाद सिद्धांत यह है कि ‘न्याय सिर्फ दिया जाना ही पर्याप्त नहीं है, यह दिखना भी चाहिए कि न्याय सचमुच में दिया भी गया।’ संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता- हां, उनके अपराध के लिए संसद में उन पर महाभियोग जरूर लाया जा सकता है। ऐसा नहीं हुआ।
पहले तो जस्टिस कर्णन के सभी प्रभावी अधिकार छीन लिए गए। फिर उनके मानसिक स्वास्थ्य की जांच के आदेश दिए गए; सामाजिक मान्यताओं के मुताबिक यह उनकी बेइज्जती का प्रयास तो था ही। प्रत्यक्ष प्रतीत हो रही दुर्भावना की अगली कड़ी यह जोड़ी गई कि मीडिया को उनकी प्रतिक्रिया प्रसारित करने से प्रतिबंधित कर दिया गया। यानी स्वतंत्र मीडिया पर सेंसर लगाया गया। यह साथ ही साथ किसी व्यक्ति के संविधान-सम्मत मौलिक अधिकार (अभिव्यक्ति के अधिकार) का हनन भी था। न्याय-प्रणाली का अतिक्रमण करते हुए अब ब्रह्मास्त्र भी चला दिया गया- उन्हें छह महीने की कैद की सजा सुना कर।

इस सबके पीछे जो यक्ष-प्रश्न छूटता चला गया है उसे सभ्य समाज को पूछने का हक है कि आखिर कर्णन असल में कहना क्या चाहते हैं? उन्होंने प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को जो चिट्ठी लिखी थी उसमें खास बात क्या थी जिसे सर्वोच्च न्यायालय आम जनता से छुपाना चाहता है? इस देश की न्याय-प्रणाली जहां कसाब जैसों तक का पक्ष जानने के लिए – समुचित न्यायिक विश्लेषण हेतु- विशेष प्रबंध करती है वहीं एक न्यायाधीश की जायज-नाजायज बातों की उचित सुनवाई का प्रबंध क्यों नहीं करती? जस्टिस कर्णन के तथाकथित अपराधों की उन्हें जरूर सजा मिलनी चाहिए, पर क्या उसका तरीका अन्यायपूर्ण और असंवैधानिक हो? यह जानना भी प्रासंगिक होगा कि मीडिया अपनी स्वतंत्रता के हनन के लिए इस बार इतना मौन क्यों है?
’शिप्रा जायसवाल, ईस्ट आॅफ कैलाश, दिल्ली

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