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चौपालः बदलाव की खातिर

इस साल अंतराष्ट्रीय महिला दिवस की थीम थी- ‘बदलाव के लिए साहसी बनो’।
Author March 18, 2017 03:20 am
(फाइल फोटो)

इस साल अंतराष्ट्रीय महिला दिवस की थीम थी- ‘बदलाव के लिए साहसी बनो’। स्वच्छ शक्ति-2017 समारोह में देशभर से आई 6,000 सरपंचों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि महिला सरपंच गांवों की तस्वीर बदलने में अपनी भूमिका निभा सकती हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्र में लगभग 68 फीसद लैंगिक असमानता बनी हुई है। आज पूरी दुनिया में इस बात को लेकर स्वीकार्यता बढ़ रही है कि लोकतांत्रिक देश में महिलाओं को उनके हक और समता से वंचित करना अलोकतांत्रिक है। बात दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की करें तो महिलाओं के तमाम संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों के बावजूद लैंगिक असमानता लगभग हर क्षेत्र में नजर आती है। आज भी भारतीय समाज का बड़ा तबका दकियानूसी मानसिकता से ग्रस्त है। यह तब ज्यादा बुरा लगता है जब पढ़ा-लिखा और खुद को सभ्य-सुशिक्षित कहने वाला परिवार भी कन्या भ्रूण हत्या जैसे घिनौने अपराध को अंजाम देता है।

देश का हर मुहल्ला, शहर तथा हर राज्य महिलाओं के लिए असुरक्षित होता जा रहा है। इस बात की तसदीक राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े भी करते हैं। महिलाओं के प्रति दिन-ब-दिन बढ़ते अपराध हमारी कानून व्यवस्था की पोल तो खोलते ही हैं, हमारे समाज की असंवेदनशीलता का भी परिचय देते हैं। वर्ष 2016 की ग्लोबल जेंडर रिपोर्ट में भारत का स्थान 87 वां है। इस रिपोर्ट से जाहिर होता है कि भारत को लैंगिक समानता के लिए लंबा सफर तय करना है। इसके अलावा चिंता का विषय है कि श्रम बल में महिलाओं की हिस्सेदारी भारत में पिछले दो दशकों में तेजी से घटी है। 1995 में जहां श्रम में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग पैंतीस फीसद थी, वह 2013 तक घटकर सत्ताईस फीसद रह गई। बात महिलाओं की राजनीति में हिस्सेदारी की करें, तो लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी महज ग्यारह फीसद और विधानसभाओं में केवल नौ प्रतिशत है। वहीं प्रशासन में महिलाओं की संख्या महज चौदह प्रतिशत और उच्च न्यायालयों में ग्यारह प्रतिशत है।

कहा जाता है कि एक पुरुष को शिक्षित करने का मतलब एक व्यक्ति को शिक्षित करना है मगर एक महिला को शिक्षित करने का अर्थ पूरे परिवार को शिक्षित करना है। ऐसे में हमारे समाज व सरकारों को समझना होगा कि महिलाओं को शिक्षित किए बगैर सशक्त, स्वावलंबी और आत्मविश्वासी नहीं बनाया जा सकता। यह अच्छी बात है कि भारत ने बालिकाओं की प्राथमिक शिक्षा के लिए नामांकन दर बालकों के लगभग समान (97 प्रतिशत) हासिल कर ली है, पर प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के बाद लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर बहुत अधिक है। ऐसे में लड़कियों को उच्च शिक्षा के वास्ते प्रोत्साहित करने के लिए परिवार, समाज और सरकारों को अपनी अहम भूमिका अदा करनी होगी।
’कैलाश बिश्नोई, मुखर्जीनगर, दिल्ली

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First Published on March 18, 2017 3:20 am

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