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चौपालः बदलाव के बरक्स

वस्तुओं, तौर-तरीकों, स्थानों, आदि के पहले से चले आए नाम बदले जाने का चलन काफी पुराना है और यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया भी है।
Author August 11, 2016 02:31 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

वस्तुओं, तौर-तरीकों, स्थानों, आदि के पहले से चले आए नाम बदले जाने का चलन काफी पुराना है और यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया भी है। वस्तुओं और तौर-तरीकों की शब्दावली में बदलाव के पीछे तो खैर एक बड़ा कारण हमारा अंग्रेजी-मोह है। चाहे परिवार या समाज में अपने बड़ों के लिए हमारे संबोधन हों या परस्पर हेलो-हाय, गुड मॉर्निंग-ईवनिंग-नाइट जैसे स्मार्ट अभिवादन हों। चेअर-टेबल-बेड-बॉक्स-बुक-बैग-विंडो-किचन-टॉयलेट’ जैसे सैकड़ों शब्द हैं, जिन्होंने आज हमारा और हमारे बच्चों का अपनी मातृभाषा से रिश्ता लगभग तोड़ दिया है। अब अपने बच्चों को ‘इंग्लिश-मीडियम स्कूल’ में पढ़ा रहे परंपरावादी परिवार घरों में पूजा-पाठ के लिए ‘पूजा-रूम’ बनवाते हैं।

मां-बाप अपने बच्चों को फलों-सब्जियों, पशु-पक्षियों या शरीर के अंगों के नाम अंग्रेजी में सिखा कर बड़ा गर्व महसूस करते हैं। इधर बसे कुछ भोजपुरी परिवारों की सीधी-सरल महिलाएं जब मुझे हैप्पी होली-दीवाली कहती हैं तो जवाब में मैं एक मीठी जिज्ञासा लेकर पूछ बैठती हूं कि इसे आप भोजपुरी बोली में कैसे कहेंगी? एक थोड़ा पढ़ी-लिखी मां को मैंने उसके साढ़े तीन साल के बच्चे को दीवार की ओर उंगली कर के कहते पाया कि ‘वो देखो देखो.. लीजर्ड!’ यों छिपकली को देखना चाहे अच्छा न लगे, पर बोलने में तो यह शब्द मीठा लगता है! पर बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में दाखिल कराया है, जहां हिंदी या मातृभाषा को देसी किसिम की भाषाएं माना जाता हैं और मां को भी तो ऐसा ही लगता है।
जहां तक स्थानों के नाम-परिवर्तन की बात है, सड़कों या गांव-कस्बों के नाम स्थानीय दिवंगत शख्सियतों के नाम पर रख दिए जाते हैं। पिछले डेढ़ दशकों में देश के नगरों-महानगरों के नाम बदले जाने के उदाहरण भी हमारे सामने हैं। इसके पीछे कुछ कारण भी रहे होंगे। हालांकि अंग्रेजीपन यहां भी तो हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा। बंबई से मुंबई नाम हो जाने पर भी अक्सर लोग इसे ‘बॉम्बे’ कहने में ही अच्छा महसूस करते हैं।
नाम-परिवर्तन के पीछे राजनीतिक दलों की अजीब-सी मंशाएं भी छिपी रहती हैं। जैसे ‘निर्मल भारत’ को अब ‘स्वच्छ भारत’ या ‘योजना आयोग’ को ‘नीति आयोग’ बना दिया गया। पिछली सरकार का किया नकारने और खुद को स्थापित करने के तुच्छ संतोष या मिथ्या दंभ के अलावा यह कुछ भी नहीं। इसी तरह अपने ‘मन की बात’ करते-करते मोदीजी को अचानक सूझा कि समाज के ‘विकलांग इंसानों को क्यों न ‘दिव्यांग’ शब्द से नवाज कर श्रद्धा के पात्र बना दिया जाए? कुछ दृष्टिबाधित लोगों से मेरी बात हुई। इस संदर्भ में उनकी प्रतिक्रिया सकारात्मक नहीं थी। हल्के-से व्यंग्य से भरा उनका विचार था कि लोग तो वैसे ही हमें देख कर कह देते हैं कि ये तो ‘रब दा रूप’ हैं। मोदीजी ने तो हमें अलौकिक ही बना दिया। अब तो हम धरती के प्राणी ही नहीं रहे।

शारीरिक हो या फिर मानसिक, अक्षमता का दुख अक्षम व्यक्ति का एक ‘सच’ है, वह पीड़ा का साकार रूप है। यदि हम इसे इसी रूप में स्वीकार करते हैं, तो संवेदना के स्तर पर उससे जुड़ते भी हैं। ‘विकलांग’ शब्द संवेदना जगाता है। ‘दिव्यांग’ बना देने पर दुख का स्वीकार-भाव नहीं रहेगा। वैसे भी अक्षम इंसान को हमारी श्रद्धा की नहीं, मैत्री, प्रेम और रचनात्मक सहयोग की जरूरत होती है। खैर, अब तो इस परिवर्तन पर मोहर लग गई। अखबार भी इस नई संज्ञा का प्रयोग कर रहे हैं। पर अच्छा नहीं लग रहा।
’शोभना विज, पटियाला

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