December 08, 2016

ताज़ा खबर

 

चौपालः गोपनीयता की मार

औचक विमुद्रीकरण के दावे के बाद खोजी पत्रकारों ने मय तथ्य बाकायदा खाता नंबर, जमा तिथि सहित बंगाल प्रदेश भाजपा के बैंक खाते मे मोदी के विमुद्रीकरण के संदेश से ठीक पहले 500 और 1000 रुपए के नोट की एक करोड़ की राशि जमा होने की जानकारी जुटा ली।

Author November 19, 2016 01:43 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

औचक विमुद्रीकरण के दावे के बाद खोजी पत्रकारों ने मय तथ्य बाकायदा खाता नंबर, जमा तिथि सहित बंगाल प्रदेश भाजपा के बैंक खाते मे मोदी के विमुद्रीकरण के संदेश से ठीक पहले 500 और 1000 रुपए के नोट की एक करोड़ की राशि जमा होने की जानकारी जुटा ली। ऐसा और भी जगहों पर देखा गया। दो दिन में हालात सामान्य होने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री के सामने बढ़ती मुश्किलें देख कर वित्तमंत्री को कहना पड़ा कि बदलाव के अनुरूप एटीएम चालू होने में दो-तीन सप्ताह का समय और लगेगा। अचानक हुई इस घोषणा ने करोड़ों लोगों पर जबर्दस्त प्रहार किया। दिहाड़ी कामगारों और छोटे कारोबारियों की आजीविका चौपट हुई। इसके चमत्कारिक असर का दावा करने वाले योजना पर फूले नहींं समा रहे थे। लेकिन जमीनी हकीकत उलटी पड़ी।
वैधानिक तौर पर देखा जाए तो आजमाई गई विमुद्रीकरण यह कार्रवाई भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता में कहीं न कहीं हस्तक्षेप को दर्शाती है। वैसे भी आजकल संस्थागत संवैधानिकता को कमजोर किया जा रहा है। संवैधानिक मान्यताओं को दरकिनार किया जा रहा है। एक लोकतांत्रिक देश में शहंशाह की तरह व्यवहार कितना उचित है? सरकार के किसी भी कदम के विरोध को देशद्रोह घोषित किया जाने लगा है। नोटबंदी की प्रक्रिया और उससे पीड़ित आमजनों की तकलीफों को मुखरित करने वालों को ‘काले चोरों’ का समर्थक करार दिया जाने लगा। जापान में जाकर ‘मैं नहींं छोड़ूंगा’ कहने का अंदाज आखिर क्या दर्शाता है?

आम जनता को अपने फायदे के लिए परेशान करने और अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने के सामने आते घटनाक्रमों की सच्चाई से आम आदमी को विश्वास होने लगा है कि नोटबंदी की इस कार्रवाई में कुछ गड़बड़ जरूर है। ये जानकारियां ज्यों-ज्यों जनता के सामने आ रही हैं, उसकी पीड़ा और आक्रोश गहरा हो रहा है। जिन मेडिकल स्टोरों, अस्पतालों, रेल, बस, मेट्रो, पेट्रोल पंपों आदि पर 500 और 1000 के नोट नोटबंदी के बाद भी कुछ दिन तक चलने की बात कही गई थी, वहां की हकीकत भी दूसरी है। नोटबंदी चलते सत्तर प्रतिशत सब्जियां खरीद के बिना सड़ गर्इं। बैंकों की तुलना में डाकघरों में उपलब्ध रकम और भी सीमित थी। ग्रामीण क्षेत्र शहरों की तुलना में और भी ज्यादा प्रभावित हुए। वहां तो बहुमत कारोबार और व्यवहार नगदी आधारित हैं।
श्रेय लेने की होड़ में किए गए इस औचक विमुद्रीकरण ने जनता को चौतरफा तकलीफों से घेर दिया। जिस जाली मुद्रा को निकालने के नाम पर यह नौटंकी की गई, उसके संबंध में संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में स्वीकार किया गया कि कुल प्रचलित मुद्रा का 0.02 प्रतिशत मात्र है, जो कुल प्रचलित मुद्रा 16.5 लाख करोड़ रुपए के मुकाबले मात्र चार सौ करोड़ के करीब बैठती है। जबकि इस प्रक्रिया इससे कई गुणा ज्यादा राशि खर्च हो जानी है। दुनियाभर में यह परंपरा रही है कि विमुद्रीकरण से काफी पहले जनता को चेता दिया जाता है। हमारे देश में इससे पहले हुए विमुद्रीकरण के समय ऐसी प्रक्रिया अपनाई गई थी। अब भी यूरोपियन यूनियन के देश अभी से जनवरी 2018 में अपनी ‘यूरो’ मुद्रा के बड़े नोटों के प्रचलन से बाहर करने के लिए सचेत कर रही है। लेकिन हमारे देश में कालेधन के स्रोत होने के नाम पर 500 और 1000 के नोट तो अचानक बंद कर दिए गए, लेकिन उनसे बड़ी राशि का 2000 रुपए का नया नोट जारी कर दिया गया। क्या यह पहले से और बड़ी राशि का नोट कालेधन का स्रोत नहींं बनेगा?२
’ रामचंद्र शर्मा, तरूछाया नगर, जयपुर

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on November 19, 2016 1:39 am

सबरंग