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चौपालः मर्यादा के विरुद्ध

‘लानत है! अगर मैं अपने कमजोर वर्ग की बात सदन में नहीं रख सकती तो मुझे सदन में रहने का कोई अधिकार नहीं है...’ मायावती के इन विगलित शब्दों ने भारतीय लोकतंत्र और संसदीय गौरव को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है।
Author July 22, 2017 02:53 am
बसपा प्रमुख मायावती (फोटो सोर्स पीटीआई)

‘लानत है! अगर मैं अपने कमजोर वर्ग की बात सदन में नहीं रख सकती तो मुझे सदन में रहने का कोई अधिकार नहीं है…’ मायावती के इन विगलित शब्दों ने भारतीय लोकतंत्र और संसदीय गौरव को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है। यह निश्चित ही अफसोसनाक है चाहे इसके लिए दोषी वे लोग हों जिन्होंने बसपा सुप्रीमो को राज्यसभा में अपनी बात रखने का पर्याप्त समय नहीं दिया या स्वयं मायावती, जिन्होंने वक्त की नजाकत समझते हुए इस्तीफा देकर ‘मास्टर स्ट्रोक’ लगाने की कोशिश की। गौरतलब है कि 2018 में मायावती की राज्यसभा सदस्यता खत्म हो रही है। इसलिए, इसकी पूरी संभावना है कि सदन में अपनी उपस्थिति को आगामी वर्षों में न पाकर उन्होंने इस मौके का भरपूर फायदा उठाते हुए अपनी सिमटती राजनीतिक जमीन पर आशा का एक बीज बोने की कोशिश की। इस नजरिये से देखा जाए तो संसद की मान-मर्यादा का हनन करने में मायावती भी बराबर की दोषी साबित हैं, जिसका ठीकरा अब तक वे केवल सत्तापक्ष और उपसभापति महोदय पर फोड़ रही हैं।

हालांकि इस पूरे प्रकरण के दौरान और भी ऐसी कई घटनाएं हुर्इं जिन्हें उचित ठहराना मुश्किल होगा। क्या यह वाजिब है कि जब किसी खास समाज से जुड़ा कोई नेता अपनी बात कहने के लिए खड़ा हो और उसे बीच में सिर्फ इसलिए रोका जाए कि वक्त इजाजत नहीं देता? क्या संसद और सांसदों पर वक्त और कानून की ऐसी पाबंदी लगाना जायज है खासकर तब जब मुद्दा गंभीर हो? क्या इससे सामाजिक मुद्दे सामने आने से पहले ही गौण नहीं हो जाएंगे? इतना ही नहीं, मायावती जब बोल रहीं थी तभी बीच में हंगामा शुरू हो गया। हालांकि, हंगामा करना आज हर पार्टी का काम हो गया है। लेकिन इसी बीच मुख्तार अब्बास नकवी का मायावती पर पीठासीन उपसभापति के निर्णय को चुनौती देने के आरोप में माफी मांगने की अपील करना भी समझ से परे था क्योंकि मायावती तब केवल अपने हक के लिए लड़ रहीं थीं।

यह वही संसद है जहां कभी लोहिया जैसे राजनेता माइक पकड़ते थे तो नेहरू तक निशब्द होकर सुनते थे। वहीं एक बार जब रामविलास पासवान किसी मुद्दे पर बोल रहे थे तो बीच में संजय गांधी उठ खड़े हुए। यह पासवान को सहन नहीं हुआ और वे भड़क उठे। तब स्वयं इंदिराजी ने सामने आकर कहा, ‘रामविलासजी, आप अनुभवी सांसद हैं, संजय को संसदीय परंपरा सीखने में अभी वक्त लगेगा। मैं खेद प्रकट करती हूं।’ लेकिन आज लगता है मानो किसी के भाषण के बीच बोलना अधिक विद्वता का परिचायक हो गया है। बात-बात पर शोर करना, वेल में जाकर हंगामा करना आम बात है। माननीयों के अमर्यादित रवैये से न केवल संसदीय गरिमा तार-तार हो रही है, बल्कि इस उम्मीद पर भी पानी फिर रहा है कि देश में पक्ष-विपक्ष के नेता मिल कर कोई फैसला ले सकते हैं या वे एक-दूसरे की बात सुनने और समझने की हिम्मत दिखा सकते हैं।

बहरहाल, मायावती का इस्तीफा देना भी सवालों से नहीं बच सकता। सदन में भाषण के दौरान उद्वेलित होने की बजाय वे धैर्य का भी परिचय दे सकतीं थी। अगर वक्त की कमी थी तो वे अपनी बातों को संक्षेप में रख कर समयावधि के नियम का पालन कर सकती थीं। बाकी की बची बातें बाहर आकर मीडिया के सामने रख कर जनता और सरकार को उनसे अवगत कराया जा सकता था। लेकिन जिस प्रकार उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम का फायदा उठाते हुए इस्तीफा देकर सत्तापक्ष को घेरने की कोशिश की उससे निश्चित ही मायावती पर भी सवाल खड़े होते हैं।
’विवेकानंद वी विमर्या, देवघर, झारखंड

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