June 24, 2017

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चौपाल: एक ही थैली के, इरोम की मिसाल

लोगों के हक के लिए अपने सोलह साल बर्बाद कर देने वाली इरोम शर्मिला को मिले महज 90 वोटों ने सोचने पर मजबूर किया ऐसे में लोकतंत्र कैसे मजबूत होगा?

Author March 21, 2017 05:34 am
इरोम शर्मीला। (Photo Source: AP/File)

एक ही थैली के

हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा और पंजाब में कांग्रेस को प्रचंड बहुमत प्राप्त हुआ है। मणिपुर और गोवा में कांग्रेस को अधिक सीटें मिलने के बावजूद भाजपा सरकार बनाने में कामयाब हुई है। इन चुनावों में बहुतेरे दलबदलु कांग्रेसियों को भाजपा ने अपना उम्मीदवार बनाया था जिन्हें बाद में मंत्री और मणिपुर में तो एन. बीरेनसिंह को मुख्यमंत्री भी बनाया है। भाजपा ने जो दांवपेच इन चुनावों में अपनाए हैं उन्हें कांग्रेस भी पूर्व में अपना चुकी है। इन चुनावों से पहले भी उत्तराखंड और अरुणाचल में भाजपा के सरकार बनाने के प्रयासों को सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने झटका दिया था। राज्यपालों की नियुक्ति, अध्यादेश आदि विभिन्न प्रकरणों में भी भाजपा ने कांग्रेस से भिन्न प्रदर्शन नहीं किया है। कांग्रेस अपने गठन के समय अर्जीनवीस संगठन था जो बाद में आंदोलन में तब्दील हो गया था। स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस एक राजनीतिक दल में रूपांतरित हो गया जिसकी अपनी विचारधारा, नीतियां व कार्यक्रम थे जो बाद में येनकेन प्रकारेण सत्ता में बने रहने के लिए एक संस्कृति के रूप में भी जाने जाते हैं। कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व एक परिवार के इर्द-गिर्द है और राज्य स्तर पर उसके कई क्षत्रप हैं, जिन्हें जब चाहे ताश के पत्तों की तरह फेंट दिए जाने से परस्पर विश्वास का अभाव है। कांगेस के कार्यकर्ताओं की इन क्षत्रपों के प्रति आस्था अधिक है क्योंकि पद और टिकट वे ही दिलवा सकते हैं।

क्षत्रप अपने चुनाव के लिए पार्टी के चिह्न और झंडे का उपयोग करते हैं लेकिन कार्यकर्ता के लिए स्वायत्त संस्थाओं के चुनाव में ‘फ्री फार आल’ करके उन्हें पार्टी के झंडे व चिह्न से दूर कर आपस में लड़ाते हैं। ऐसे में पार्टी के प्रति रुचि कैसे विकसित होगी, एकता कैसे कायम होगी, संघर्ष का माद्दा कैसे बनेगा? नेहरू जन्म शताब्दी के अवसर पर राहुल गांधी ने ब्लाक स्तर तक पदयात्राओं का कार्यक्रम दिया था मगर हमारी जानकारी में एक भी पदयात्रा नहीं आई है। कांग्रेस से अलग हुए क्षत्रपों में सिर्फ शरद पवार और ममता बनर्जी ही जनसमर्थन व स्वतंत्र अस्तित्व बना पाए हैं।अब जब भाजपा भी उन्हों उसूलों, मूल्यों, राजनीतिक संस्कृति व नेताओं / कार्यकर्ताओं को अपना रही है तो कांग्रेस मुक्त भारत के क्या मायने हैं? शुचिता और ‘पार्टी विद डिफरेंस’ की क्या स्थिति है?

सुरेश  उपाध्याय,गीता नगर, इंदौर

इरोम की मिसाल

पांच राज्यों के अप्रत्याशित चुनाव परिणामों ने सबको चौंकाया। विश्लेषकों का कहना है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए मतदाताओं की सोच बदल रही है! लेकिन इस सबके बीच मणिपुर के चुनाव में कि लोगों के हक के लिए अपने सोलह  साल बर्बाद कर देने वाली इरोम शर्मिला को मिले महज 90 वोटों ने सोचने पर मजबूर किया ऐसे में लोकतंत्र कैसे मजबूत होगा? भले ही मीडिया का दायरा बढ़ा है लेकिन वह लोगों के लिए संघर्ष करने वाले और ईमानदार लोगों को जगह नहीं देता। ऊलजलूल बयान देने वाले नेताओं को खूब जगह दी जाती है! मतदाताओं की सोच बदलती तो इरोम शर्मिला को सिर्फ 90 वोट नहीं मिलते और आपराधिक छवि के लोग चुनाव नहीं जीतते।

जफर अहमद, रामपुर डेहरू, मधेपुरा, बिहार

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First Published on March 21, 2017 5:34 am

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