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अपराधी की रिहाई

निर्भया कांड का किशोर अपराधी सुधार-गृह में तीन साल की सजा पूरी करने के बाद अब मुक्त हवा में सांसें ले सकेगा। इस मामले में हादसे का शिकार हुई लड़की के माता-पिता सहित अनेक आम नागरिकों, खासकर महिलाओं की चिंता और विरोध प्रकट करना उचित है..
Author नई दिल्ली | December 20, 2015 21:04 pm
निर्भया बलात्कार केस में शामिल नाबालिग अपराधी।

निर्भया कांड का किशोर अपराधी सुधार-गृह में तीन साल की सजा पूरी करने के बाद अब मुक्त हवा में सांसें ले सकेगा। इस मामले में हादसे का शिकार हुई लड़की के माता-पिता सहित अनेक आम नागरिकों, खासकर महिलाओं की चिंता और विरोध प्रकट करना उचित है। सरकार को इस मामले में सोचना चाहिए। एक खतरनाक अपराधी की पहचान सार्वजनिक होनी चाहिए, ताकि लोग उससे सावधान रह सकें। उसका स्वतंत्र घूमना समाज के लिए सचमुच गंभीर चिंता की बात है। एक ऐसा मामला, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया, उसे लेकर क्या व्यवस्था को ज्यादा चुस्ती नहीं दिखानी चाहिए?

इसी संबंध में जो दूसरी बात व्यथित करती है वह यह कि हमारे देश में जब कभी मानवाधिकार, महिला अधिकार या किशोर अधिकारों की रक्षा की बात होती है तो ऐसे बर्बर अपराधियों को बचाने की चिंता रहती है और उनकी वकालत में अनेक संगठन मुखर हो जाते हैं, जबकि इन कानूनों का उद्देश्य बेकसूर, निर्बल, कानून-व्यवस्था में आस्था रखने वाले लोगों को संरक्षण देना होना चाहिए। हमारी व्यवस्था निर्भया जैसी एक महिला को इतने भयंकर अपराध से नहीं बचा पाती, बाल अधिकार और संरक्षण के लिए बने आयोग, अधिकारी, कानून बच्चों/किशोरों को अमानवीय दशा में सड़कों पर भीख मांगने, फुटपाथ पर सोने, सड़कों के किनारे ढाबों में काम करने से नहीं रोक पाती! इनका जिम्मा लिए बैठे लोगों को ये सब कैसे नहीं दिखते! लेकिन निर्भया के मामले में क्रूरता की सारी हदें पार करने वाले किशोर के अधिकारों की रक्षा के लिए न जाने कितने लोगों ने आवाज उठाई!  (कमल कुमार जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड)

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कुदरत की करवट

शहरों और गावों को स्मार्ट बनाने के लिए जबर्दस्त मंथन चल रहा है। मगर जब देश के दो प्रमुख महानगर तमाम भौतिक संसाधनों से परिपूर्ण होने के बावजूद मानव जीवन के लिए सबसे बदतर शहर बन गए हैं, तो उनमें आए बदलावों के कारण ढूढ़ना महत्त्वपूर्ण हो गया है। नब्बे लाख की आबादी वाले चेन्नई की साठ फीसद आबादी कई दिनों तक पानी से घिरी रही, तो दूसरी ओर करीब एक करोड़ की आबादी वाली दिल्ली प्रदूषण की वजह से राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गई है।

दरअसल प्रकृति ने जिस तरह करवट ली है, उससे कोई नई समस्या नहीं उभरी है, बल्कि ये वही समस्याएं हैं जो अक्सर राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनती हैं। दिल्ली, गुंडगाव समेत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और उसके आसपास के शहरों में पेड़ों की कटाई और उद्योगों में इजाफा जिस तेजी में हुआ है उससे न सिर्फ जमीन और जल स्रोत प्रदूषित हुए हैं, बल्कि वायुमंडल पर भी इसका दूरगामी प्रभाव दिखने लगा है।

इन शहरों की स्थिति अचानक इतनी भयावह कैसे हो गई? इन पर कभी रोक लगाने की कोशिश क्यों नहीं की गई? इन समस्याओं का कारण है मनुष्य के जीवन स्तर को बेहतर, सरल और आरामदायक बनाने की खोखली चाहत और अतिमहत्त्वाकांक्षा।

भले कार्बन उत्सर्जन के लिए विकसित राष्ट्रों को जिम्मेदार ठहराया जाए, पर इन मामलों में भारत के आंकड़े भी संतोषजनक नहीं हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारण, कार्बन उत्सर्जन में चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ के बाद भारत चौथे स्थान पर है। आज यह जरूरी है कि हम अपनी असीमित आकांक्षाओं और जरूरतों को दरकिनार कर आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण कदम उठाएं। (शुभम श्रीवास्तव, गाजीपुर)

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खुदकुशी के परिसर

‘सर मैं रात में सो नहीं पाता, सपने में मुझे बॉयलाजी की किताबों में से सांप और राक्षस निकलते नजर आते हैं। मैं यहां नहीं रह पाऊंगा।’ ऐ शब्द हैं कोटा में कोचिंग करने वाले एक छात्र के। गौरतलब है कि पिछले एक साल में कोटा में चौबीस छात्रों ने आत्महत्या कर ली है। देश की बात करें तो सिर्फ बोर्ड परीक्षा के बाद के महीने में 2,406 छात्रों ने आत्महत्या कर ली। पर पता नहीं कैसे इतनी घटनाओं के बाद भी यह मुद्दा मीडिया की नजर में नहीं आया।

आज किसानों की आत्महत्या को लेकर पूरे देश में रोष है, हर राजनेता इस मुद्दे पर बयान देता है। मगर विद्यार्थियों की किसी को परवाह क्यों नहीं है? क्या सिर्फ इसलिए कि ये राजनीति का हिस्सा नहीं हैं? क्या सिर्फ राजनीतिक हित के लिए एक पूरी नस्ल की बलि चढ़ा दी जानी चाहिए? (सौरभ कुमार, रामगढ़, झारखंड)

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पर्यावरण और कर्तव्य

जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न समस्याओं ने पर्यावरण वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी है। वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संतुलन के मुद्दे जैसे-कार्बन उत्सर्जन, ठोस कचरा निपटान, ग्रीन हाउस गैस, रासायनिक यंत्र, जीवाश्म र्इंधन उपभोग, सागरतल का बढ़ना और तापमान में लगातार वृद्धि आदि को लेकर बैठकें होती रहती हैं। इन बैठकों से निकलने वाले नियम-सुझावों को बहुत कम देश लागू कर पाते हैं। ये पर्यावरणीय नियम देश के विकास में आड़े आते हैं, क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से रोकते हैं।

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति कहती है कि उचित निगरानी और पर्यावरणीय आवश्यकताओं के मध्य संतुलन की आवश्यकता है। बहरहाल, यह भी स्पष्ट है कि स्वस्थ पर्यावरण बनाए रखना केवल सरकार की नहीं, बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक की मौलिक जिम्मेदारी है। हम सबको अपने-अपने स्तर से समाज और देश के लिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का प्रयास शुरू कर देना चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़ी के पास स्वच्छ हवा, साफ पानी और शुद्ध भोजन हो। (पवन मौर्य, बनारस)

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