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कैसा राष्ट्रवाद

समझौता कभी इकतरफा नहीं होता। एक हाथ से लेना तो दूसरे हाथ से देना भी होता है। खैर, यह अच्छी बात है कि भारत-बांग्लादेश के बीच जमीन विवाद अंतत: लगभग खत्म हो गया। दोनों सरकारों को साधुवाद आगे आने के लिए। अब लोग एक उम्मीद से जिएंगे। पर एक सवाल अब भी जिंदा है। जब […]
Author June 11, 2015 08:51 am

समझौता कभी इकतरफा नहीं होता। एक हाथ से लेना तो दूसरे हाथ से देना भी होता है। खैर, यह अच्छी बात है कि भारत-बांग्लादेश के बीच जमीन विवाद अंतत: लगभग खत्म हो गया। दोनों सरकारों को साधुवाद आगे आने के लिए। अब लोग एक उम्मीद से जिएंगे।

पर एक सवाल अब भी जिंदा है। जब कांग्रेस बांग्लादेश से जमीन विवाद हल करना चाहती थी तब वह राष्ट्रद्रोही कैसे हो गई थी (जैसा कि भाजपा के सभी बड़े नेताओं के पुराने ट्वीट्स हैं…और सुषमाजी ने तो संसद में बयान तक दे डाला कि यह योजना यूपीए की ही है, इसमें कुछ भी बदला नहीं गया है। यहां तक कि ‘कॉमा’ और ‘फुल स्टॉप’ को भी जस का तस रखा गया है)।
और अब मोदीजी ने 111 भारतीय गांव बांग्लादेश को दे दिए।

देश का नक्शा बदल गया। सत्रह हजार एकड़ जमीन बांग्लादेश को दे दी। अब तो किसी हिंदूवादी का खून नहीं खौलेगा! अगर खौलेगा भी तो कुछ नहीं कर पाएंगे क्योंकि उनके मसीहा ने जो ये कदम उठाया है! अंदाजा लगाइए, अगर मनमोहन सिंह ने बांग्लादेश को इतने गांव दे दिए होते तो? यहां एक वाजिब सवाल है कि जब जिंदगी भर राष्ट्रवाद की दुहाई देकर विरोध ही कर रहे थे तो यूपीए की योजना की ‘कॉपी-पेस्ट’ क्यों?

रवि कुमार, जनेवि, नई दिल्ली

 

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