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बेतुकी बहस

प्रधानमंत्री के तौर पर मोदीजी की चुनावी रैली के दौरान की गई ‘स्कैम’ शब्द की व्याख्या ठीक नहीं मालूम होती।
Author नई दिल्ली | February 13, 2017 06:33 am
मनमोहन सिंह को लेकर मोदी के बयान पर कई कांग्रेस नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।

लोकतंत्र सभी नागरिकों को अपनी बात रखने का अधिकार देता है। इसी लचीलेपन के कारण नेताओं के तीखे तेवर देखने को मिलते हैं। शासन की खामियां दूर करने के लिए इस तरह की व्यवस्था की गई है ताकि विपक्ष सरकार को मनमानी करने से रोक सके। लेकिन आजकल बेतुकी बहसें भी चर्चा में रहती हंै। बजट आया लेकिन बजट से बिलकुल असंबद्ध बातें बहस में घुसपैठिए की तरह अपना वर्चस्व कायम कर बैठीं! प्रधानमंत्री के तौर पर मोदीजी की चुनावी रैली के दौरान की गई ‘स्कैम’ शब्द की व्याख्या ठीक नहीं मालूम होती। अब तो इस तरह के बेतुके शब्द बोलने की परंपरा संसद में भी घुसपैठ कर गई है। बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण परधन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा में सोच के परे कई बातें सुनने को मिलीं। कांग्रेस नेता खरगे की कुत्ते वाली बात और उस पर मोदीजी का भूकम्प के बहाने राहुल को लपेटना दिखाता है कि जनता को किस चालाकी के साथ बेवकूफ बनाया जा रहा है।
(चंद्रकांत, एएमयू, अलीगढ़)

पैसे की राजनीति
एक आम धारणा है कि लोकतंत्र में हर व्यक्ति का बराबर अधिकार है। पर असल में ऐसा है नहीं। आज बड़े-बड़े थैलीशाह लगभग हर राजनीतिक पार्टी को अकूत पैसा देते हैं। जाहिर-सी बात है कि जो पैसा देगा वह तो चाहेगा ही कि शासक पार्टी उसके अनुसार कानून और नियम बनाए ताकि उसने चंदे के रूप में जो पैसा दिया है उससे कई गुना वसूल करे।
प्रश्न है कि यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें मत गौण हो और पैसा सर्वोपरि हो जाए? पैसे से राजनीति को प्रभावित करना एक तरह से रिश्वत ही है। तो रिश्वतखोर राजनीति रिश्वतखोर सरकार ही चला सकती है!

(निर्मल कुमार शर्मा, प्रताप विहार, गाजियाबाद)

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