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भ्रष्टाचार के विरुद्ध

पिछले दिनों एक सुकून भरी खबर आई कि केंद्र सरकार ने दो आइपीएस अफसरों को खराब प्रदर्शन के आधार पर जबरन सेवानिवृत्त कर दिया।
Author नई दिल्ली | February 13, 2017 06:14 am
लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (PTI Photo/TV GRAB/6 Feb, 2017)

पिछले दिनों एक सुकून भरी खबर आई कि केंद्र सरकार ने दो आइपीएस अफसरों को खराब प्रदर्शन के आधार पर जबरन सेवानिवृत्त कर दिया। लेकिन यह रस्म अदायगी भर न हो, बल्कि ऐसे ही प्रयासों का और विस्तार होना चाहिए। नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त और प्रभावी कदम उठाना समय की मांग है। आजादी के सत्तर सालों में देश को भ्रष्टाचार के घुन ने खोखला बना दिया है। कई बार तो आम आदमी को लगता है कि ईमानदार होना गुनाह है। ईमानदार लोग अगर सरकारी कार्यालय में अपना कोई काम करवाने जाएं तो उन्हें दफ्तरों के चक्कर लगाते चप्पलें घिस जाती हैं, पर काम नहीं हो पाता। दूसरी तरफ कुछ लोग रिश्वत देकर अपना काम करवाते हैं, जिससे रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। आज आलम यह है कि रिश्वत देकर हजारों-लाखों छात्र सरकारी नौकरी हासिल कर रहे हैं, दूसरी तरफ दिन-रात मेहनत करने वाले छात्र नौकरी न मिलने के कारण अवसाद के शिकार हो रहे है। जो लाखों रुपए घूस देकर सरकारी अधिकारी या कर्मचारी बन रहे हैं क्या उनसे ईमानदार होने की उम्मीद की जा सकती है?

प्रधानमंत्री जनांकिकी लाभांश की बात करते रहे हैं तो उन्होंने क्या युवाओं में नैतिक मूल्यों के लिए कोई ठोस पहल की है? भारत को जिस रफ्तार से विकास करना था, उस रफ्तार को नौकरशाही ने हासिल नहीं होने दिया। जितनी भी योजनाएं, कार्यक्रम तथा नीतियां बनाई गर्इं, वे प्रशासनिक अधिकारियों की जेबें भरने का जरिया बन कर रह गर्इं। जो योजनाएं गरीबी दूर करने के लिए बनार्इं, उनका राजनेताओं और अफसरों ने अपनी अमीरी बढ़ाने के लिए उपयोग कर लिया। ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल’ की हालिया रिपोर्ट में हमारी रैंकिंग सब-सहारा अफ्रीका के कुछ गरीब देशों से भी खराब है। उदारीकरण की नीतियों को मंत्रियों-अफसरों और ठेकेदारों की तिकड़ी ने सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की तरह इस्तेमाल किया है। उदारवादी नीतियां आने के बाद भी भारत में लाइसेंस-कोटा-परमिट राज खत्म तो नहीं हुआ, पर रूप जरूर बदला है और भ्रष्टाचार पर कोई खास आघात नहीं हुआ है। यह अच्छी बात है कि भ्रष्टाचार के मुद््दे पर नागरिक समाज और न्यायपालिका ने सक्रियता दिखाई है। लेकिन इतना काफी नहीं है। प्रशासनिक, राजनीतिक और न्यायिक सुधार के लिए सरकार को प्रभावी कदम उठाने के अलावा समावेशी विकास तथा सुशासन की स्थापना के लिए भ्रष्टाचार पर भी सर्जिकल स्ट्राइक करनी चाहिए।
(कैलाश बिश्नोई, फलोदी, जोधपुर)

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