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चौपालः संकट की फसल

पर्यावरण, वन, विज्ञान व तकनीकी मंत्रालयों से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति ने हाल ही में ‘जीएम फसलों के पर्यावरण पर असर’ विषय पर अपनी रिपोर्ट में बहुत सामयिक व महत्त्वपूर्ण चेतावनियां दी हैं।
Author September 16, 2017 03:00 am

पर्यावरण, वन, विज्ञान व तकनीकी मंत्रालयों से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति ने हाल ही में ‘जीएम फसलों के पर्यावरण पर असर’ विषय पर अपनी रिपोर्ट में बहुत सामयिक व महत्त्वपूर्ण चेतावनियां दी हैं। इस रिपोर्ट में संसद और सरकार का ध्यान इस ओर दिलाया गया है कि हमारे देश में जीएम फसलों के जो नियामक (रेगुलेटर) हैं, वे प्राय: उस जानकारी के भरोसे बैठे हैं जो जीएम फसलों के प्रसार की अनुमति मांगने वाले उपलब्ध कराते हैं। समिति ने कहा है कि इस कारण यह संभावना बनी रहती है कि जीएम फसलों की तकनीकी विकसित करने वाले अपनी जरूरतों के अनुसार जानकारी में हेराफेरी करें।

संसदीय समिति के मुताबिक जीएम फसलों से जुड़े जैव सुरक्षा के सरोकारों व इनके सामाजिक-आर्थिक औचित्य की स्वतंत्र पारदर्शी समीक्षा व इनसे जुड़ी किसी भी समस्या की क्षति की जिम्मेदारी निर्धारित करने के लिए जब तक सही व्यवस्था स्थापित व स्थिर नहीं हो जाती है तब तक किसी जीएम फसल को अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। उसके अनुसार जीएम फसलों की समीक्षा करते समय इनके दीर्घकालीन असर पर ध्यान देना जरूरी है।

यहां गौरतलब है कि हाल के जीएम सरसों के विवाद में अभी कई प्रश्नों का उत्तर नहीं मिल सका है। अनेक राज्य सरकारें ऐसी फसलों के व्यापारिक प्रसार की स्वीकृति देने के विरुद्ध हैं। इसके मद्देनदर संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि पर्यावरण मंत्रालय को जीएम फसलों के पर्यावरण पर असर की बहुत विस्तार व गहराई से समीक्षा करनी चाहिए और इस समीक्षा में संबंधित सरकारी एंजेंसियों, विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों, सिविल सोसाइटी व अन्य की भागेदारी प्राप्त करनी चाहिए ताकि इस बारे में कोई निर्णय लेने से पहले देश में संभावित परिणामों के बारे में स्पष्टता हो सके।
’भारत डोगरा, रक्षा कुंज, पश्चिम विहार, दिल्ल

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