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चौपालः न्याय की नीति

पीलीभीत फर्जी मुठभेड़ मामले में पिछले दिनों सीबीआई की विशेष अदालत ने फैसला सुनाया और अपराध में लिप्त कुल सत्तावन पुलिस वालों में से जीवित बचे सभी सैंतालीस को उम्र कैद की सजा सुनाई।
Author April 9, 2016 02:05 am
अधिकतम सजा की मांग करते हुए अभियोजक ने दलील दी कि विदेशी के साथ हुआ अपराध बर्बरतापूर्ण एवं अमानवीय ढंग से किया गया तथा इन दोषियों ने देश की छवि पर धब्बा लगाया है।

पीलीभीत फर्जी मुठभेड़ मामले में पिछले दिनों सीबीआई की विशेष अदालत ने फैसला सुनाया और अपराध में लिप्त कुल सत्तावन पुलिस वालों में से जीवित बचे सभी सैंतालीस को उम्र कैद की सजा सुनाई। इन लोगों ने सिख तीर्थयात्रियों की एक बस से दस युवकों को उतार कर सुनियोजित ढंग से तीन अलग-अलग जगहों पर उनकी हत्या कर दी थी और प्रचारित किया था कि ये सिख आतंकी मुठभेड़ में मारे गए। इस फर्जी मुठभेड़ के पीछे पुलिस वालों की मंशा पदोन्नति और ईनाम पाने की थी।

जब यह घटना घटी होगी तब मेरी उम्र करीब इक्कीस साल रही होगी। पीलीभीत उत्तराखंड की सीमा से लगा इलाका है। लेकिन इस घटना को भूल चुका था तो इसमें दोष मेरी स्मरण शक्ति से ज्यादा सुस्त न्यायिक प्रणाली का है, जिसने सजा सुनाने में पच्चीस साल लगा दिए। अभी भी अभियुक्त अपील करेंगे और अंतिम फैसला आने और फिर उस पर अमल होने में पता नहीं और कितने साल गुजर जाएंगे!

भारत में पुलिस की छवि बहुत खराब रही है, जिसका मुख्य कारण ब्रिटिश शासन से आजादी मिलने के बावजूद पुलिस की भूमिका में जो बुनियादी बदलाव होने चाहिए थे, उनका नहीं होना है। जहां तक फर्जी मुठभेड़ों का प्रश्न है, गलतफहमी, खतरनाक अपराधियों को ठिकाने लगाने या रंजिश के कारण पुलिस लोगों को मुठभेड़ बता कर मार देती है या पूछताछ के दौरान अत्यधिक यातना के कारण मौत होने पर मुठभेड़ में मौत होना बता दिया जाता है।

लेकिन पदोन्नति और पुरस्कार पाने की आशा से निर्दोष युवकों का अपहरण करके उनकी हत्या की बात भयावह लगती है। पिछले साल, या उससे पहले कश्मीर में सेना के कुछ अधिकारियों ने भी प्रमोशन और ईनाम पाने के लालच में कुछ निर्दोष युवकों को अलगाववादी बता कर मार डाला था। मेरठ के निकट बागपत में माया त्यागी केस में पुलिसकर्मियों द्वारा इस शादीशुदा और गर्भवती महिला से की जा रही छेड़छाड़ का विरोध और पिटाई का बदला लेने के लिए पुलिस वालों ने साथ के पुरुष रिश्तेदारों को भून डाला और माया त्यागी के साथ थाने में वहशियाना दुर्व्यवहार किया था।

इस मामले में न्यायालय का फैसला आने में भी लंबा वक्त लगा था। पुलिस द्वारा किसी निर्दोष को अलगाववादी, आतंकी या अपराधी बताना और उसकी हत्या करके मुठभेड़ में मार गिराने का दावा एक गंभीर मामला है। लेकिन भारतीय न्याय प्रणाली में न्याय हमेशा विलंब से ही मिल पाता है जो एक तरह से न्याय की हत्या होने जैसा है।
’कमल कुमार जोशी अल्मोड़ा, उत्तराखंड

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