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चौपाल: मैली सोच

किसी व्यक्ति से महज इसलिए भेदभाव करना कि वह विशेष धर्म, लिंग, पेशे या जाति से जुड़ा है, उस व्यक्ति के मानवाधिकारों का हनन है।
Author March 13, 2017 05:51 am
किसी व्यक्ति से महज इसलिए भेदभाव करना कि वह विशेष धर्म, लिंग, पेशे या जाति से जुड़ा है, उस व्यक्ति के मानवाधिकारों का हनन है।

मैली सोच

अनीता मिश्रा ने ‘सभ्य होने की चेतना’ (दुनिया मेरे आगे, 10 मार्च) में समाज की एक महत्त्वपूर्ण बुराई की ओर ध्यान दिलाया है कि आज भी हमारे यहां जातीय और पेशागत भेदभाव स्पष्ट न सही, पर छुपे हुए रूप में विद्यमान है। कहते हैं कि शिक्षा के साथ-साथ व्यक्ति के मानसिक स्तर में बदलाव होता है, जिससे लोगों की सोच विस्तृत होती है और सोच के साथ-साथ समाज भी बदलता है। इससे समाज के वंचित लोगों को मुख्यधारा से जुड़ने का मौका मिलता है। पर सब शिक्षित लोग ही रूढ़िवादिता और पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो जाएं तो सामाजिक परिवर्तन की गति मंद हो जाती है। किसी व्यक्ति से महज इसलिए भेदभाव करना कि वह विशेष धर्म, लिंग, पेशे या जाति से जुड़ा है, उस व्यक्ति के मानवाधिकारों का हनन है।

कैसी विडंबना है कि साफ-सफाई से जुड़े व्यक्तियों को सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है! वे हमारी गंदगी उठाएं और तिरस्कार भी सहें, जबकि स्वच्छता अभियान का ढिंढोरा पीटने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। इस अभियान में उन्हें छोड़ दिया जाता है जो प्रतिदिन हमारे परिवेश को स्वच्छ रखने के लिए अपने स्वास्थ्य पर खतरा मोल लेते हैं। हम सबको चाहिए कि अपने बच्चों को शिक्षित करने के साथ-साथ दीक्षित भी करें, ताकि किसी व्यक्ति के आत्मसम्मान को इस कारण चोट न पहुंचे कि वह कथित निम्न स्तर के पेशे से जुड़ा है। मानव की गरिमा मानव के जीवन जितनी ही महत्त्वपूर्ण होती है चाहे वह किसी की भी हो, यह बात हमें अवश्य याद रखनी चाहिए।

’राजेश कुमार, भेल, हरिद्वार

आबादी का मिथक
अरुणाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने केंद्र सरकार पर अरुणाचल को हिंदू राज्य में बदलने की कोशिश करने का आरोप लगाया था। इसके जवाब में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने ट्वीट किया कि देश में हिंदुओं की आबादी इसलिए कम हो रही है कि वे धर्म परिवर्तन नहीं कराते जबकि अल्पसंख्यकों की तादाद हमारे यहां तेजी से बढ़ रही है। इससे पहले भी संघ परिवार के कुछ नेता लगातार ऐसे आरोप लगाते रहे हैं जबकि हिंदुस्तान में हिंदुओं की आबादी का अनुपात इतना अधिक है कि वहां तक मुसलमानों के पहुंचने की दूर तक कोई संभावना नहीं है। लेकिन समय-समय पर मुसलमानों की बढ़ती हुई फर्जी आबादी के आंकड़े गिना कर इतना भयभीत किया जाता है कि एक दिन आएगा जब हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे।
आज के संवेदनशील वातावरण में वे लोग भी ऐसे बयान देने लगे हैं जो केंद्र सरकार में महत्त्वपूर्ण पदों पर हैं। इस प्रकार के बयानों से बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों में दूरियां ही पैदा होंगी।
’आसिफ खान, बाबरपुर, दिल्ली

आतंक की रेल
मध्यप्रदेश के शाजापुर में भोपाल-उज्जैन पैसेंजर ट्रेन में धमाके के बाद करीब दस यात्रियों के घायल होने और मृत्यु की खबर आई। इसके पहले उत्तर प्रदेश के कानपुर में भी रेल हादसा हुआ। आए दिन जिस तरीके से रेलगाड़ियों को निशाना बनाया जा रहा है उससे आम नागरिकों में डर का माहौल बन गया है। भारत में यातायात के लिए सब रेलवे को ही अपनी पहली पसंद मानते हैं लेकिन इस तरह के हादसों से आम आदमी का रेलवे पर भरोसा डिग रहा है। इस तरह की मौतों का जिम्मेदार कौन है, राज्य या फिर केंद्र सरकार? आखिर आतंक की चपेट में रेलगाड़ियां कब तक आती रहेंगी?
’प्रदीप कुमार तिवारी, ग्रेटर नोएडा

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