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राजपाट: सियासी पैंतरेबाजी

उत्तराखंड में कांग्रेस की तस्वीर ज्यादा उजली नहीं लग रही। विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं है।
Author December 12, 2016 04:47 am
सीएम हरीश रावत। (फोटो- ANI)

उत्तराखंड में कांग्रेस की तस्वीर ज्यादा उजली नहीं लग रही। विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं है। तो भी पार्टी के नेताओं में एका के बजाए बिखराव ही बढ़ रहा है। काशीपुर में सतत विकास संकल्प रैली के समापन के मौके पर हरीश रावत, किशोर उपाध्याय और यशपाल आर्य के आपसी मतभेद सार्वजनिक हो गए। रैली के मंच पर लगे बैनर से आर्य की तस्वीर नदारद थी। जबकि वे पार्टी के सूबे के सबसे कद्दावर दलित नेता माने जाते हैं। नाराज आर्य बैनर देख रैली बीच में ही छोड़ होटल में जा बैठे। मजबूरी में मुख्यमंत्री हरीश रावत को भी उनकी चिरौरी के लिए होटल में जाना पड़ा। तीन घंटे लग गए नाराज आर्य को मना कर वापस मंच पर लाने में। किशोर उपाध्याय को भी रावत ने नाम का सूबेदार बना दिया है। जबकि यशपाल आर्य की नाराजगी की वजह दसरे दलित नेता प्रदीप टमटा को ज्यादा तवज्जो दिया जाना है। टमटा को आर्य के विरोध की अनदेखी कर रावत ने पिछले दिनों राज्यसभा सदस्य बनवा दिया था। यशपाल आर्य समझ चुके हैं कि उनका कद तराशने के लिए मुख्यमंत्री टमटा को जानबूझ कर बढ़ावा दे रहे हैं। आर्य पार्टी के सूबेदार भी रह चुके हैं और मंत्री तो खैर हैं ही। नारायण दत्त तिवारी के चेले माने जाते हैं आर्य। काशीपुर में कांग्रेस की सतत विकास संकल्प रैली के फीका रह जाने के मायने अब हर सियासतदां अपने तईं निकाल रहा है।

महेश्वर सिंह आजकल मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निशाने पर हैं। जब अपनी अलग पार्टी हिलोपा थी तो हिमाचल के मुख्यमंत्री का गुणगान करते थकते नहीं थे महेश्वर। बेशक हिलोपा के वे इकलौते ही विधायक ठहरे। भाजपा में अपनी उपेक्षा से दुखी होकर बनाई थी अलग पार्टी हिलोपा। पर भाजपा को कमजोर नहीं कर पाए। अलबत्ता आखिर में भाजपा में ही बना लिया फिर अपना ठिकाना। वीरभद्र को आंखें दिखाना चाहा था। पर वीरभद्र ने उनके भाई करण सिंह को मंत्री बना उन्हें झटका दे दिया। ऊपर से कुल्लू के रघुनाथ मंदिर के अधिग्रहण का अल्टीमेटम अलग दे डाला। गनीमत है कि वक्त रहते महेश्वर इस फैसले के खिलाफ अदालत चले गए और स्टे ले आए। मंदिर जैसे धार्मिक मुद्दे की आड़ में जन भावनाओं को पक्ष में करने की कवायद में जुट गए। फरमाया कि वीरभद्र समझ लें कि स्वर्ग या नर्क में किसी को भेजना मुख्यमंत्री के हाथ में नहीं। मुख्यमंत्री को तो अपनी चिंता करनी चाहिए कि लंबी उम्र के बाद उन्हें स्वर्ग ही मिले। वीरभद्र तो महेश्वर की नुक्ताचीनी का जवाब देना नहीं चाहते पर उनकी पार्टी के लोग जरूर भाजपा के पीछे पड़ गए हैं। खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे जैसे जुमले पेश कर खिल्ली उड़ा रहे हैं भाजपा की।

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