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विकास का मार्ग

किसी गांव के विकास में पक्की सड़क की बहुत बड़ी भूमिका होती है। सड़कें न हों तो गांव विकास की राह से कटा हुआ रहता है।
Author July 17, 2017 03:45 am
सड़क निर्माण (प्रतीकात्मक तस्वीर)

विकास का मार्ग

किसी गांव के विकास में पक्की सड़क की बहुत बड़ी भूमिका होती है। सड़कें न हों तो गांव विकास की राह से कटा हुआ रहता है। शहर से गांव आना हो या गांव से शहर की ओर जाना, सड़क ही होती है जो दोनों को एक-दूसरे से जोड़ कर विकास की राह आसान बनाती है। सरकार ने 25 दिसंबर, 2000 को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) प्रारंभ की थी। यह शत-प्रतिशत केंद्र द्वारा प्रायोजित योजना है। इस कार्यक्रम के लिए हाई स्पीड डीजल (एचएसडी) पर पचास प्रतिशत उपकर निर्धारित है। योजना के उद्देश्यों में पहुंचविहीन ग्रामीण बसाहटों को बारहमासी सड़कों से जोड़ना और मापदंड के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों की सड़कों का सुधार कार्य शामिल है। पिछले सत्रह सालों से चली आ रही यह योजना देश के उन ग्रामीणों के लिए वरदान साबित हुई जो कभी समुचित संपर्कता के अभाव में देश की मुख्यधारा की सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों में सम्मिलित होने से वंचित रह जाते थे। ऐसे क्षेत्रों में बारिश के मौसम में स्थिति और भी बिगड़ जाती थी जब पक्के सड़क विहीन पहुंच मार्ग दलदल में तब्दील हो जाया करते थे जिन पर लोगों का चलना तक दूभर हो जाता था। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की सड़कों ने ग्रामों के आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। किसानों की मंडियों, बड़े बाजारों तक पहुंच आसान हुई है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सुचारु संचालन संभव हो पाया है। इन सड़कों ने लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच सुनिचित की है। संस्थागत प्रसव को बढ़ावा मिला है। मातृत्व मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में आई उल्लेखनीय कमी इसका सुखद परिणाम है।

उक्त योजना से अब दूरस्थ गांव में बिजली पहुंचाने में मदद मिली है जिससे गांव डिजिटल क्रांति का लाभ उठाने की स्थिति में आ रहे हैं। गांवों में स्कूल छोड़ देने वाले बच्चों की संख्या में भी कमी आई है, साथ ही विद्यार्थियों का शहर की उच्च शिक्षण संस्थाओं, महाविद्यालयों से जुड़ना संभव हो पाया है। 2017-18 के बजट में पीएमजीएसवाई के लिए 19000 हजार करोड़ आबंटित किए गए हैं। सरकार 2017-18 में 156 किलोमीटर प्रतिदिन की गति से 57000 किलोमीटर सड़क बनाने का लक्ष्य रखा है। आशा है, निकट भविष्य में देश की देश बाकि बची पहुंचविहीन आबादी भी शीघ्र ही पीएमजीएसवाई का लाभ उठा पाएगी और देश के समावेशी विकास के लक्ष्य की ओर बढ़ने में भागीदारी होगी।
’ऋषभ देव पाण्डेय, कोरबा, छत्तीसगढ़
सियासी भोज

‘फलां-फलां नेता ने दलितों के साथ बैठ कर खाना खाया।’ क्या आपको नहीं लगता कि अखबारों-पत्रिकाओं में छपा यह वाक्य दलितों का अपमान करता है? यह काम तो आम भारतीय, चाहे वह किसी भी जाति का हो, वर्षों से करता आ रहा है। आजकल ही नहीं, वर्षों से विभिन्न कार्यालयों और दूसरे स्थानों में काम करने वाले संगी-साथी एक प्लेट में खाते चले आ रहे हैं भले ही उनमें एक शर्मा, दूसरा वर्मा, तीसरा जाटव और चौथा किसी भी धर्म या मजहब से ताल्लुक रखता हो। दरअसल, अखबारों में ऐसी खबरें पढ़ कर लगता है जैसे इससे पहले कभी किसी कथित सवर्ण नेता ने महामहिम केआर नारायणन, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन, सुशील कुमार शिंदे, रामविलास पासवान, मायावती या अनेकानेक दलित मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और विद्वानों के साथ भोजन नहीं किया! अगर ऐसा है तो यह एक ‘राष्ट्रीय शर्म’ का विषय है। साथ की बात तो छोड़िए, कई दशकों से देश के करोड़ों लोग खाना खाते वक्त किसी होटल, ढाबे या कैंटीन में कभी यह नहीं पूछते कि भोजन पकाने वाला किस जाति का है? ऐसे में भैया अगर राजनीति ही करनी है तो कोई दूसरा तरीका ढूंढ़ो! वोट लेने के लिए ऐसा ड्रामा घटिया मनोवृत्ति का परिचायक है। यह तो जख्म कुरेदने वाला तरीका है। यह पत्ता तो पिट गया समझो!
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, दिल्ली

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First Published on July 17, 2017 3:45 am

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