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चौपाल: सामूहिक अमानवीयता

एक आदिवासी अपनी पत्नी की लाश को बारह किलोमीटर तक सिर्फ इसलिए कंधे पर ढोकर ले जाता है कि उसके पास एंबुलेंस के लिए पैसे नहीं थे।
Author August 31, 2016 23:33 pm
ओड़िशा के दाना माझी 12 किलोमीटर तक अपनी पत्नी का शव कंधे पर लेकर चले। इस तस्वीर का इस्तेमाल खबर में प्रतीकात्मक चित्र के रूप में किया गया है। (Express photo)

पिछले दिनों देश में चार ऐसी घटनाएं घटीं जो मानवीय संवेदनाओं और हमारे सभ्य कहे जाने वाले समाज को शर्मसार करने के लिए काफी हैं। पहली घटना ओड़िशा के कालीहांडी की है जहां एक आदिवासी अपनी पत्नी की लाश को बारह किलोमीटर तक सिर्फ इसलिए कंधे पर ढोकर ले जाता है कि उसके पास एंबुलेंस के लिए पैसे नहीं थे। इन बारह किलोमीटर तक कोई उसकी मदद नहीं करता और लोग इस नजारे के तमाशबीन बने रहते हैं। दूसरी घटना भी इसी राज्य के बालासोर जिले की है जहां एक वृद्धा की लाश के धड़ के नीचे के पूरे हिस्से को निर्ममता से तोड़ कर सिर्फ इसलिए एक पोटली बना लिया जाता है ताकि उसे दूर ले जाने में सुविधा हो सके। तीसरी घटना मध्यप्रदेश के दमोह की है जहां अपनी बीमार पत्नी के साथ बस में यात्रा कर रहे व्यक्ति को ड्राइवर और कंडक्टर एक सुनसान इलाके में सिर्फ इसलिए उतार देते हैं कि उसकी पत्नी बस में ही मर जाती है। बस में उस व्यक्ति के साथ एक पांच माह की बेटी भी थी। चौथी घटना भी मध्यप्रदेश के जबलपुर के निकट एक गांव की है, जहां महिला की अर्थी को उसके परिजन छाती-छाती तक पानी से भरे नाले से होकर सिर्फ इसलिए ले जाते हैं कि श्मशान तक जाने के मूल रास्ते पर गांव के दबंगों ने कब्जा कर रखा है।

ये चारों घटनाएं इंसानियत के साथ एक भद्दा मजाक हैं। आश्चर्य है कि इन घटनाओं में एक समाज के रूप में हम ही शोषक हैं और हम ही चश्मदीद-तमाशबीन भी हैं। यहां एक शोषक से ज्यादा तकलीफदेह आचरण उस समाज का है जो पर-पीड़ा में नजारे का केवल तमाशबीन बना रहना चाहता है। क्या एक सामाजिक समूह के रूप में हम इतने निष्ठुर हो गए हैं कि बदहवासी से बहते हुए वक्त में हमारी मानवीय संवेदनाएं भी निर्ममता के चरम स्तर तक कुंद हो चली हैं? क्या हमारा समाज इतना भयावह बन चुका है कि इसमें हमें अपने सिवा कुछ भी दिखाई नहीं देता है? यह हमारे आत्मकेंद्रित स्वार्थ की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है जो मानवीय मूल्यों को लगातार विस्मृत करते जा रहे हैं! ऐसी घटनाएं हमारे अमानवीय चेहरे से नकाब उतार कर रख देती हैं। देखा जाए तो व्यक्तिगत स्तर पर हमारा समाज ‘मेरे-तेरे’ वाले स्वार्थ के भाव में आकंठ डूब चुका है। हमें केवल अपना दुख उद्वेलित करता है, जबकि पराया दुख जरा भी उद्वेलित नहीं करता।

इन घटनाओं के लिए हम शासन-प्रशासन और व्यवस्था को कोस सकते हैं और कोस भी रहे हैं मगर उससे पहले इनके लिए एक सामाजिक समूह के रूप में हम खुद जिम्मेदार हैं। जब हम आपस में अपनी मानवीय संवेदनाओं का सम्मान नहीं कर सकते, एक-दूजे का दुख-दर्द साझा नहीं कर सकते, तब ऐसी घटनाओं के लिए व्यवस्था को क्यों दोष दिया जाए!
’राजेश सेन, अम्बिकापुरी एक्सटेंशन, इंदौर

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