ताज़ा खबर
 

चौपाल: सरासर औपचारिक

इतने औपचारिक कि अपने-पराए की समझ खोते जा रहे हैं। मम्मी-पापा तक को ‘आई लव यू’ और ‘थैंक्यू’ जैसे शब्द थमाने की परंपरा पिल पड़ी है।
Author नई दिल्ली | August 31, 2016 05:36 am
हिंदी भाषा व्याकरण

औपचारिकताओं में क्या रखा है! मैं औपचारिकताओं से हमेशा नाक-भौं सिकोड़ता रहा हूं और अपनी इसी गैर-औपचारिक हरकत की वजह से कई बार औपचारिक सभाओं में असभ्य करार भी दिया जाता रहा हूं। पर आजकल देख रहा हूं कि दुनिया हद से ज्यादा औपचारिक होती जा रही है। दिखावे के चलन को खूब बढ़ावा मिल रहा है। ‘सॉरी, थैंक्यू, आई लव यू, आई मिस यू’ या ‘हर्ष है, खेद है, विषाद है, पीड़ा है…मुबारक हो…पार्टी हो…काबिल हो’ आदि शब्द जहां-तहां लटके-चिपके दिखाई पड़ते हैं। हर छोटी-बड़ी बात को जताने की कोशिश हो रही है। हममें भावनाओं को व्यक्त करने और समझने की समझ मर रही है। हम औपचारिक बन रहे हैं, व्यावहारिक नहीं! इतने औपचारिक कि अपने-पराए की समझ खोते जा रहे हैं। मम्मी-पापा तक को ‘आई लव यू’ और ‘थैंक्यू’ जैसे शब्द थमाने की परंपरा पिल पड़ी है। कभी-कभी तो हम सोचते हैं कि अगर अपने पिता को आई लव यू पापा बोल दें तो उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी?

यह फिल्मी सीन नहीं है लल्ला, सोच कर देखो, बौरा जाओगे! इस प्रकार की स्वीकारोक्ति से अतिरिक्त प्यार थोड़े झलक आता है, बल्कि ऊपर से संदेह की भनक लगने लगती है कि आखिर यह सब कहने की क्या जरूरत आन पड़ी? अभिभावकों का वह स्नेह, जिसे अब तक ‘अनकंडीशनल लव’ कहा जाता था, उससे अप्रत्यक्ष रूप से अहसानों की बू आने लगती है। रिश्तों की अहमियत गिर रही है। शब्दों का दायरा सिकुड़ा है। इनके मतलब भी बदल रहे हैं। नायक, नायिका, प्रेमी, सहेली, सखा, सौतेला सभी ‘आई लव यू’ हैं! चारों तरफ भ्रम फैल रहा है। ‘सॉरी’ तो राह चलते लोग ऐसे पलट के बोलते हैं जैसे फेंक कर मुंह पे मार रहे हों! राजनीतिक बयानबाजी में भी इन शब्दों को मजाक या मोहरों की तरह प्रयोग किया जा रहा है। कुल मिलाकर यह मानवजाति की भावनात्मक अभिव्यक्तियों के पतन का दौर है और हम इसमें राजी-खुशी शरीक हो रहे हैं। जिम्मेदारियां और कर्तव्य धीरे-धीरे एहसान-फरेबी में तब्दील होते जा रहे हैं। सामाजिक दायित्वों का कत्ल-ए-आम चल रहा है। यह औपचारिकता भी क्या तेज मीठी छुरी है जो खून भी करती है और खून बहने भी नहीं देती। इसमें एहसास है मगर इनकार नहीं। एतराज है मगर चीत्कार नहीं!

घोर षड्यंत्रों और विश्वासघातों की दुनिया में यह औपचारिकता, कुकृत्यों पर ‘चारित्रिक-कलेवर’ चढ़ाने का काम भी करती है। इतनी कपटी और दोमुंही औपचारिकता को यदि आप व्यावहारिकता मान रहे हैं तो फिर आप सरासर औपचारिक हैं! वैसे मेरे समर्थन में तो बच्चन दादू भी लिख गए हैं: ‘क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी…क्या करूं / मैं दुखी जब-जब हुआ संवेदना तुमने दिखाई/ मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा रीति दोनों ने निभाई/ क्यों हमारे बीच धोखे का रहे व्यापार जारी/ क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी….क्या करूं!’
अर्पित तिवारी, दिल्ली विश्वविद्यालय

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग