ताज़ा खबर
 

द्वेष का सामना

शिवसेना के सांसद संजय राउत ने मुसलमानों को मताधिकार से वंचित करने की असाधारण मांग करते हुए पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में लिखा है कि जब तक वोट बैंक की राजनीति में वे खेलते रहेंगे, उनका कोई भविष्य नहीं है। यहां गौरतलब है कि बाला साहब ठाकरे ने भी मुसलमानों का मताधिकार हटा […]
Author May 27, 2015 10:27 am

शिवसेना के सांसद संजय राउत ने मुसलमानों को मताधिकार से वंचित करने की असाधारण मांग करते हुए पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में लिखा है कि जब तक वोट बैंक की राजनीति में वे खेलते रहेंगे, उनका कोई भविष्य नहीं है। यहां गौरतलब है कि बाला साहब ठाकरे ने भी मुसलमानों का मताधिकार हटा देने की बात कही थी। संजय राउत कैसे भूल गए कि कुछ वर्ष पूर्व बाला साहब ठाकरे ने अपने भाषण में जब इसी प्रकार की बात कही थी तो स्वयं उनका मताधिकार भी कुछ वर्ष के लिए छीन लिया गया था।

यह संपादकीय उस समय छपा था जब मुंबई के उपनगर बांद्रा में उपचुनाव की सूचना जारी कर दी गई थी। संजय राउत का यह सुझाव किसी भी राजनीतिक दल के गले नहीं उतरेगा। भाजपा, जो केंद्र के साथ ही महाराष्ट्र में भी शिवसेना के साथ सत्तारूढ़ है, ने ठीक ही संजय राउत के इस विचार से अपने को अलग कर रखा है। यदि राउत का यह दावा कि कुछ राजनीतिक दल चुनाव के अवसर पर मुसलमानों का उपयोग वोट बैंक के रूप में करते हैं, सही भी हो, तो इन दलों की मानसिक कमजोरियों के लिए मुसलमानों को बलि का बकरा क्यों बनाना चाहिए? अब जब संजय राउत को पता चला कि उनके इस विचार को किसी भी ओर से कोई समर्थन नहीं मिल रहा है तो वे यह कह कर बगलें झांकने लगे हैं कि उनके कथन का गलत अर्थ लगाया जा रहा है।

जहां तक विभिन्न राजनीतिक दलों के मुसलमानों को खुश रखने की बात है, मीडिया अच्छी तरह जानता है कि इसके बावजूद प्रत्येक क्षेत्र में मुसलमानों की स्थिति शोचनीय है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि संजय राउत की इस मांग से उनकी पार्टी शिवसेना को लाभ की बजाय हानि ही अधिक हुई है। उनका तर्क यह है कि मुसलमानों का उपयोग अक्सर सभी राजनीतिक दलों द्वारा वोट बैंक की राजनीति के लिए किया जाता है। उनका यह कहना कुछ अंशों तक सही भी हो, लेकिन इसके लिए जो रास्ता सुझाया है उसके लिए संविधान में कोई स्थान नहीं है।

सीधी-सी बात यह है कि दो गलत बातों को मिला कर कोई सही बात नहीं बनती। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि सभी राजनीतिक दलों के साथ ही शिवसेना के साथी दलों ने भी इसका विरोध किया है। और तो और, शिवसेना के वरिष्ठ नेता भी भी इससे पार्टी की बिगड़ी छवि को सुधारने के लिए अपने अलग-अलग बयान से तरह-तरह की सफाई देकर बचाव करने की कोशिश कर रहे हैं। दुख की बात है कि यह संपादकीय आंबेडकर जयंती के अवसर पर प्रकाशित हुआ है। हमारे संविधान के निर्माण में आंबेडकर की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है और उसमें धर्म, जाति और लिंग के भेद का ध्यान न रखते हुए सभी लोगों को समान मताधिकार देने की बात की दुनिया भर में प्रशंसा की गई है।

देश की स्वतंत्रता के अवसर पर जब अधिकांश जनता गरीब और अशिक्षित थी, बहुत से नेताओं ने आशंका व्यक्त की थी कि समान मताधिकार से स्वाधीन भारत के स्थायित्व और शक्तिशाली बनने की राह में बाधा आएगी। पर उस समय आंबेडकर के साथ ही कुछ अन्य नेताओं ने भी उनकी बात पर ध्यान न देकर जनता में विश्वास रखा और उसके बाद तो हम देख ही रहे हैं, भारत का अब तक का इतिहास इसका गवाह है कि वे गलत नहीं थे।

आज हमारे लिए यह निश्चय ही चिंता की बात है कि कुछ नेता बिना इस बात का विचार किए कि हमारा संविधान, जो पिछले छह दशक तक सभी तरह की विघ्न बाधाओं के सामने अडिग रहा है, उसमें संशोधन की बात कह रहे हैं। स्वाधीनता के बाद से ही अल्पसंख्यक, विशेषकर मुसलमानों को लुभाने के लिए सभी दलों ने तरह-तरह के प्रयास किए हैं। इससे अल्पसंख्यकों को कोई लाभ हुआ हो, यह देखने में नहीं आया है। इस प्रकार की राजनीति से देश के सामाजिक सौहार्द को भी खतरा है। आवश्यकता उन्हें मताधिकार से वंचित कराने की नहीं बल्कि साफ-सुथरी राजनीति और सुशासन देने की है। मुसलमान, विशेषकर युवा वर्ग, इस बात को समझने लगा है कि उसके मतों का दुरुपयोग किया जाता रहा है। इसका परिणाम हुआ है कि नए और पुराने दोनों ही मतदाता पुराने मतदान तरीकों से हट कर नई राह पर चल पड़े हैं।
महेंद्र राजा जैन, इलाहाबाद

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- http://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- http://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.