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सम्मान का छल

भारत रत्न के नाम पर मोदी सरकार ने जो वैचारिक-रणनीतिक घपला मालवीयजी के साथ किया है, वह सरदार पटेल के साथ किए गए छल की अगली कड़ी है। यहां यह साफ करना जरूरी है कि इस घपले के पर्दाफाश का कांग्रेस की दलीय राजनीति से कोई संबंध नहीं है। मोदी ने देश-विदेशों में गांधीजी के […]
Author December 27, 2014 13:19 pm

भारत रत्न के नाम पर मोदी सरकार ने जो वैचारिक-रणनीतिक घपला मालवीयजी के साथ किया है, वह सरदार पटेल के साथ किए गए छल की अगली कड़ी है। यहां यह साफ करना जरूरी है कि इस घपले के पर्दाफाश का कांग्रेस की दलीय राजनीति से कोई संबंध नहीं है।

मोदी ने देश-विदेशों में गांधीजी के प्रति जो अकाल सम्मान प्रकट करना शुरू किया है, उसके बीज अटलजी ने ही डाल दिए थे। गांधीवादी समाजवाद के साथ दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की जुगलबंदी की वह कोशिश इसी घालमेल की पृष्ठभूमि थी। गांधीजी की वैचारिक विरासत पर केवल योग्य कांग्रेसियों का एकाधिकार नहीं है लेकिन जिस दल और विचारधारा से जुड़े लोग खुल्लमखुल्ला गांधीजी की शारीरिक और वैचारिक हत्या के पक्षधर रहे हों उनसे पूछा तो जा ही सकता है कि यह ‘यू टर्न’ क्यों? क्या सत्ता बिना गांधी का नाम लिए नहीं मिल सकती या भारत की जनता केवल और केवल गांधी के नाम पर ठगी जा सकती है? गांधी भी खुद को हिंदू कहते थे लेकिन उनका हिंदुत्व एकांगी, संकीर्ण, घृणा, हिंसा पर आधारित न होकर अहिंसक, सर्वसमावेशी और सहिष्णु था। यही वजह थी कि भारतीय जनता को गोलवलकर का हिंदुत्व कभी रास नहीं आया। ईश्वर, अल्लाह और यीशु का मिलाजुला हिंदुत्व ही उन्हें देश का सर्वमान्य राष्ट्रपिता बना पाया। यही कारण था कि वे मृत्युपर्यंत भारत का विभाजन मन से स्वीकार नहीं कर पाए भले इसी के चलते उनकी हत्या हो गई।

गांधीजी ने इन्हीं हर तरह की कट्टरताओं से बचने और उनका विरोध करने के लिए सोच समझ कर हर वर्ग के ऐसे लोगों को साथ लिया था जो इस जटिल लड़ाई में मजबूती से उनके साथ आखिर तक डटे रहें न कि भाग जाएं या अंग्रेजों से मिल जाएं। कहने की जरूरत नहीं कि मुसलिम लीग की कट्टरता के खिलाफ लड़ाई में मालवीयजी उनके उदारवादी दृष्टिकोण के हिंदुत्व के अडिग प्रतिनिधि थे। उन्हें किसी भारत रत्न की अपेक्षा किसी से नहीं थी। नेहरू की कांग्रेस से भी नहीं।

मालवीयजी को मोदी सरकार द्वारा वाजपेयीजी के साथ भारत रत्न से सम्मानित करने के पीछे कोई उदारता नहीं, हिंदुत्व की यही रणनीति है जो बिना किसी छिटपुट विरोध के कारगर होती दिख रही है तो हौसला बढ़ता जा रहा है रणनीतिकारों का। लुंजपुंज कांग्रेस में आह और कराह लेने तक का दम न बचा हो तो यह जिम्मा बौद्धिकों को उठाना चाहिए, जो उनकी तरफ से रामचंद्र गुहा ने कुछ-कुछ उठाया है लेकिन इस मुद्दे पर जनता के बीच व्यापक बहस गायब है ।

मालवीयजी अपनी दृढ़ता से हिंदू होने की अटल घोषणा के बावजूद देश में रहने वाले मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति असम्मान और घृणा रखने के खिलाफ थे, जबकि गोलवलकर से लेकर भागवत तक निरंतर जहर उगलते रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में मालवीयजी को दिया जाने वाला भारत रत्न उनका सम्मान नहीं, अपने दलीय स्वार्थों की पूर्ति में उनका बेशर्म इस्तेमाल भर है। यानी आप कहते कुछ रहें, करते कुछ रहें और दिखते कुछ रहें अपनी तमाम सरकारी प्रभुता, दिव्यता और सत्ता के साथ।

मूलचंद गौतम, चंदौसी, संभल

 

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