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गरीब का हक

गरीब की जिंदगी दिन-ब-दिन मुश्किल होती जा रही है। जिन सुविधाओं का वह हकदार है, वे लचर नीतियों, व्यवस्थागत खामियों की वजह से उससे दूर होती जा रही हैं। आजादी के बाद..
Author भोपाल | October 12, 2015 17:14 pm

गरीब की जिंदगी दिन-ब-दिन मुश्किल होती जा रही है। जिन सुविधाओं का वह हकदार है, वे लचर नीतियों, व्यवस्थागत खामियों की वजह से उससे दूर होती जा रही हैं। आजादी के बाद से ही समाज के इस तबके के लिए अनेक कार्यक्रम और नीतियां बनाई और लागू की गर्इं, जिससे कि ये समाज की मुख्यधारा में जुड़ सकें, मगर हुआ यह कि इन कार्यक्रमों का लाभ लेने के लिए भी इन लोगों को अफसरों, हुक्मरानों के सामने नतमस्तक होना पड़ा। और तो और, योजनाओं में पंजीकृत होने के लिए भी पैसे देने पड़ते हैं।

इन बेचारे गरीब, निर्बल, अनपढ़ लोगों से तो प्रशासन में मौजूद लोग राशनकार्ड, मतदाता पहचानपत्र, आधार कार्ड जल्दी बनवाने और सुधार करवाने के नाम पर पैसों की उगाही करते हैं। अति तो तब हो जाती है जब राहत और बचाव राशि, सूखा मुआवजा या अन्य किसी प्राकृतिक आपदा के समय आया पैसा, आनाज और दवाइयां भी जरूरतमंदों को न देकर, नीचे से ऊपर तक बैठे नौकरशाहों और राजनेताओं में बंट जाती हैं।

हमारे तंत्र को लगा यह अभिशाप एक लाइलाज बीमारी की तरह दिन-ब-दिन फैलता जा रहा है, जिससे समाज में विद्वेष की भावना पनप रही है, जो हमारे भारतीय समाज के लिए घातक है। क्या हम इस अभिशाप को खत्म करने में कदम से कदम मिला कर नहीं चल सकते!
अंतरिक्ष कर सिंह, भोपाल

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