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अधिग्रहण की जमीन

पिछले आम चुनाव में यूपीए सरकार की अलोकप्रियता के साथ ही ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे और विदेशों में जमा भारतीयों का काला धन वापस लाने के वायदे ने भाजपा को ऐतिहासिक बहुमत दिलाया। लेकिन सत्ता की शह पर संघ परिवार, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा के कुछ सांसदों के अविवेकपूर्ण और सांप्रदायिक उन्माद […]
Author February 28, 2015 17:16 pm

पिछले आम चुनाव में यूपीए सरकार की अलोकप्रियता के साथ ही ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे और विदेशों में जमा भारतीयों का काला धन वापस लाने के वायदे ने भाजपा को ऐतिहासिक बहुमत दिलाया। लेकिन सत्ता की शह पर संघ परिवार, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा के कुछ सांसदों के अविवेकपूर्ण और सांप्रदायिक उन्माद भड़काने वाले बयान और मोदी सरकार के एक के बाद एक जारी अध्यादेशों से चिंता होती है।

इसी कड़ी में सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का तीव्र विरोध हो रहा था। लेकिन विरोध की परवाह किए बिना सरकार इसे कानून का रूप देने के लिए संसद में विधेयक ले आई है। विपक्षी दलों, किसान नेताओं, बुद्धिजीवियों और राजग में शामिल सहयोगी शिवसेना ने भी विरोध जताया है और समाजसेवी अण्णा हजारे इसके विरोध में देशवासियों को जगाने के लिए दिल्ली में फिर आंदोलन शुरू कर चुके हैं।

विधेयक के पक्ष-विपक्ष में सरकार और विरोधियों के अपने-अपने तर्क हैं। लेकिन ब्रिटिश शासन में 1894 में बने 119 साल पुराने कानून की जगह यूपीए सरकार के समय 2013 में जो कानून पारित हुआ उसमें वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन सहित भाजपा के अनेक नेताओं का समर्थन और सहयोग रहा। अब पलटी क्यों? दूसरी बात, इसमें ऐसा क्या प्रावधान है जिसे खेती-किसानी या किसानों के दीर्घकालीन हितों की दृष्टि से अच्छा कहा जा सकता है? अब रक्षा सहित बहुत-सी परियोजनाओं के लिए बिना किसानों की सहमति के ही भूमि अधिग्रहीत की जा सकेगी, उन्हें अधिग्रहण के विरुद्ध न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के अधिकार से वंचित किया गया है। पांच साल तक अधिग्रहीत भूमि पर काम शुरू नहीं होने या मुआवजा न मिलने की स्थिति में किसान को भूमि वापस मिलने का प्रावधान हटा दिया गया है।

सरकार की ओर से विधेयक के पक्ष में दो मुख्य दलीलें हैं। पहली, विकास के लिए भूमि चाहिए और दूसरी, जमीन के बदले मुआवजे की दर बढ़ा दी गई है। लेकिन सवाल है कि बड़े बांधों सहित जितनी ‘विकास योजनाएं’ कही जाने वाली परियोजनाएं बनती हैं उनके लिए त्याग की उम्मीद उन्हीं से क्यों की जाती है जो वंचित हैं? उम्मीद ही नहीं की जाती बल्कि जो थोड़ी-बहुत खेती की जमीन, जंगल या चरागाह हैं उन्हें ‘राष्ट्रीय हित’ के नाम पर उनसे जबरन छीना जाता है, पानी में डुबो दिया जाता है या वहां कारखाने बना दिए जाते हैं। पूछा जा सकता है कि राजनेता, भूमिपति, उद्योगपति, अफसर आदि क्या त्याग करते हैं?

यह कटु सत्य है कि भारत में आज बहुत कम लोग खेतीबाड़ी करना चाहते हैं। शायद बहुत से किसानों को जमीन के बदले मुआवजा लेकर आराम से जीवन व्यतीत करना अच्छा लगे। भारत के सकल घरेलू उत्पादन में खेती का योगदान कम होता जा रहा है। ऐसे में जब खेती में लगे लोगों का प्रतिशत भारत में अब भी बहुत ज्यादा है, जीडीपी में खेती का अंश घटना चिंता का मुद्दा होना था, लेकिन चिंता नहीं दिखती। भारत में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। सरकार को सोचना है कि भारत में खेती का क्या महत्त्व है? क्या अन्न के मामले में आत्मनिर्भरता की अब जरूरत नहीं है?

भारत में खेतीबाड़ी करना एक उच्च जोखिम भरा और घाटे का सौदा बनता जा रहा है। हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद कभी सूखा तो कभी अतिवृष्टि या ओलावृष्टि, कभी फसल में रोग लगना, पैदावार ज्यादा भी हो जाए तो बाजार में मूल्य कितना मिल पाएगा, पता नहीं। परंपरागत फसलों के बजाय नकदी फसलें उगाने के लिए उसे सब्जबाग तो दिखाए जाते हैं, लेकिन यह नहीं सोचा जाता कि इसमें कई गुना अधिक निवेश करना पड़ता है। इतनी बड़ी रकम किसान को मिलेगी कहां से? मिल भी गई तो नुकसान होने की स्थिति में क्या होगा? तब उसके पीछे मदद के लिए कौन खड़ा रहता है?
कमल जोशी, अल्मोड़ा

 

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