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किसकी खातिर

तीस जनवरी शहीद दिवस पर गांधीजी को श्रद्धांजलि देते हुए देश एक नई चुनौती से गुजरता दिखा। सरकारी विज्ञापन के जरिए हमारे संविधान से ‘समाजवादी पंथनिरपेक्ष’ को बाहर करने की करतूत और उसे सही ठहराने वाले मंत्रियों के बयान नए खतरे के संकेत दे रहे हैं। सरकार की सरपरस्ती में कुछ लोग देश में स्थापित […]
Author February 9, 2015 16:22 pm

तीस जनवरी शहीद दिवस पर गांधीजी को श्रद्धांजलि देते हुए देश एक नई चुनौती से गुजरता दिखा। सरकारी विज्ञापन के जरिए हमारे संविधान से ‘समाजवादी पंथनिरपेक्ष’ को बाहर करने की करतूत और उसे सही ठहराने वाले मंत्रियों के बयान नए खतरे के संकेत दे रहे हैं। सरकार की सरपरस्ती में कुछ लोग देश में स्थापित विविधता में एकता और सद्भाव के बहुमन और ताने-बाने को एकांगी सोच में बदलने को जुटे हुए हैं। एक तरफ गांधीजी का नाम भुनाने या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि बनाने के लिए स्वच्छता अभियान का दिखावा है तो दूसरी ओर उनके हत्यारे का महिमामंडन जारी है। ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा, पर सद्भाव के विनाश का हरकारा दोनों एक साथ कैसे संभव हैं। शांति और सद्भाव के बिना न तो विकास संभव है और न ही खुशहाली। यह भी जरूरी नहीं कि विकास से ही खुशहाली आएगी।

खुशहाली के लिए सबसे पहले चाहिए सद्भाव और उसके साथ चाहिए बेहतर शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, समतापूर्ण परिवेश, समग्र वितरण, समरस संस्कृति और सामाजिक न्याय। हमारे देश में जिस तरह के विकास को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति को गणतंत्र दिवस का मुख्य आतिथ्य नवाजा गया और विदेशी निवेश के लिए रेड कॉरपेट बिछाए जा रहे हैं, उसके कारनामों से न केवल आमजन की जमापूंजियों को सोख लिया गया है, बल्कि दुनिया मात्र एक प्रतिशत अमीरों के पास दुनिया की आधी आबादी के बराबर संपदा सिमट कर रह गई है।

मोदी सरकार का नारा ‘सबका साथ सबका विकास’ प्रत्यक्ष में कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। जबकि सबके साथ के नाम पर वोट लेकर कुछ का विकास होता दिखाई देता रहा। ओबामा का जिस तरह से स्वागत और कॉरपोरेट सीइओ जिस तरह से भाजपा की सदस्यता ले रहे हैं, वे यह दर्शाने के लिए काफी हैं कि मोदी सरकार देश के सकल स्रोतों का बहाव कुछ हाथों में करने की ओर बढ़ रही है। भारत का ही नहीं, पूरे विश्व का व्यापारी वर्ग मोदी की मेहमाननवाजी से खुश है। उनके लिए वे क्या-क्या नहीं कर रहे हैं। मजदूर को मजबूर बनाने के लिए मालिकों का मनचाहा कानून बना रहे हैं तो किसान से कॉरपोरेट की इच्छित जमीन अवाप्त करने के लिए अध्यादेश जारी कर दिया है।
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी को खुश करने के लिए बीमा और मेडिकल उपकरण क्षेत्र में विदेशी पूंजी बढ़ाने के लिए अध्यादेश जारी कर दिया है तो रेल, रक्षा आदि में विदेशी निवेश के द्वार खोल दिए हैं। इन सबसे अलग जिस परमाणु बिजली उत्पादन से अमेरिका सहित तमाम विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने तौबा कर रखी है, भारत में उसे अपने यहां आगे बढ़ाने के लिए मनमोहन सिंह के काल में अमेरिका से परमाणु बिजली से संबंधित उपकरण और यूरेनियम के लिए जो करार किया था और वामदलों के समर्थन वापस और विरोध के चलते समझौते में विचलन आ गया था। उस लंबित करार में दुर्घटना की जवाबदेही से आपूर्तिकर्ता को मुक्त कर देश की सार्वजनिक बीमा कंपनियों के मत्थे मढ़ने की होशियारी से भला अमेरिका क्यों, दुनिया का सारा कॉरपोरेट जगत गदगद क्यों नहीं होगा!

रामचंद्र शर्मा, तरुछाया नगर, जयपुर

 

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