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वापसी का प्रश्न

पिछले दिनों ‘विश्व-शरणार्थी दिवस’ पर विस्थापित कश्मीरी पंडितों ने देश में जगह-जगह प्रदर्शन किए। उन्होंने अपने लिए अलग ‘होमलैंड’ की मांग दोहराई मगर अभी तक सरकार की तरफ से उनकी ‘घर-वापसी’ का कोई कारगर प्रारूप/ प्रस्ताव सामने आया नहीं है। अपने ही देश में शरणार्थी बना यह जन-समुदाय पिछले लगभग पचीस वर्षों से एक अलग […]
Author July 7, 2015 17:38 pm

पिछले दिनों ‘विश्व-शरणार्थी दिवस’ पर विस्थापित कश्मीरी पंडितों ने देश में जगह-जगह प्रदर्शन किए। उन्होंने अपने लिए अलग ‘होमलैंड’ की मांग दोहराई मगर अभी तक सरकार की तरफ से उनकी ‘घर-वापसी’ का कोई कारगर प्रारूप/ प्रस्ताव सामने आया नहीं है। अपने ही देश में शरणार्थी बना यह जन-समुदाय पिछले लगभग पचीस वर्षों से एक अलग होमलैंड की मांग कर रहा है। कोई सरकार इस समुदाय की मांग को सिरे से खारिज तो नहीं करती मगर इनके सपनों को पूरा भी नहीं करती।

दरअसल, अड़चनें कई तरह की हैं। जैसे ही सरकार इस दिशा में कोई कारगर योजना बनाने की पहल करती है तो कश्मीर के अलगाववादी धड़ों के कान खड़े हो जाते हैं और वे पंडितों की अलग होमलैंड वाली बात का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतर आते हैं। दूसरी अड़चन यह है कि कोई भी आंदोलन जब बहुत लंबा खिंचता है तो आंदोलन चलाने वाले नेताओं में भी मतैक्य नहीं रहता। उनमें परस्पर कटुताएं-स्पर्द्धाएं उभरने लगती हैं और वे अलग-अलग बयान देने लगते हैं।

पंडितों का एक वर्ग कश्मीर लौटने के पक्ष में है तो दूसरा विरोध में। दूसरे पक्ष का कहना है कि हमसे अगर घर-वापसी की बात की जा रही है तो क्या गारंटी है कि हमारे साथ दुबारा वह न घटे जो हमने आज से पचीस साल पहले झेला था।

रही बात अलग से होमलैंड का निर्माण करने की और वहां पंडितों को ले जाकर बसाने की, तो कहने को यह बात सरल लगती है मगर इसे अमल में लाना असंभव नहीं तो मुश्किल अवश्य है। वादी में पंडितों को अलग से बसाने के लिए एक वृहत भू-खंड अगर सरकार आवंटित कर भी देती है तो इस होमलैंड में आवास, शिक्षा, रोजगार, यातायात, चिकित्सा आदि से जुड़े संसाधनों को विकसित करने में कितना समय और धन लगेगा, यह एक विचारणीय प्रश्न है।

उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना आदि राज्यों की बात दूसरी है। ये जिन राज्यों से जिस तरह अलग हए, वह सब भौगोलिक सीमाओं के भीतर हुआ। लोग इधर से उधर नहीं हुए और न बेघर हुए। कश्मीर का मामला दूसरा है। कश्मीर के ‘होमलैंड’ में लोग बाहर से आकर बसेंगे। उन्हें पूरी सुरक्षा के साथ-साथ वे सारी सुविधाएं देनी होंगी जिनका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। कभी-कभी वादे तो हम कर देते हैं मगर जब जमीनी हकीकतें उभरने लगती हैं तो समझ में आने लगता है कि मामला उतना आसान नहीं है।
शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

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