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गरिमा के विरुद्ध

नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं पर कभी-कभी उनके आग्रहों और एकपक्षीय सोच से लगता है कि वे समूह विशेष के नेता हैं, किसी टीले के नेता हैं! या वे इस देश के प्रधानमंत्री न होकर केवल भाजपा के प्रधानमंत्री हैं! लोकसभा चुनाव में उन्होंने जो प्रचार किया, जो वायदे किए वह शायद एक राजनेता […]
Author February 3, 2015 12:58 pm

नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं पर कभी-कभी उनके आग्रहों और एकपक्षीय सोच से लगता है कि वे समूह विशेष के नेता हैं, किसी टीले के नेता हैं! या वे इस देश के प्रधानमंत्री न होकर केवल भाजपा के प्रधानमंत्री हैं! लोकसभा चुनाव में उन्होंने जो प्रचार किया, जो वायदे किए वह शायद एक राजनेता के लिए स्वाभाविक था। हर बड़ा नेता अपनी पार्टी के लिए काम करता है और फिर मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे, उनकी जिम्मेदारी तो और भी बढ़ गई थी।

प्रचार के दौरान किए गए वायदों पर अमल की चर्चा फिर की जा सकती है। पर उनकी बातों को सुना गया और उनकी हर बात पर ताली बजी, उनके हर जुमले का आनंद लिया गया। बदलाव की इच्छा में लोगों ने मां-बेटे की सरकार, बाप-बेटे की सरकार या फिर बाप-बेटी की सरकार जैसे प्रत्यक्ष हमलों को भी स्वीकार किया। उस वक्त लोगों का एक ही सपना और इरादा था कि किसी तरह कांग्रेस की भ्रष्ट सरकार से पीछा छूटे और जल्दी से कोई वैकल्पिक व्यवस्था बने। कांग्रेस के प्रति अलगाव और मोदीजी की खुद की तैयारी ने काम आसान कर दिया और वे प्रधानमंत्री बन गए।

अब जब वे प्रधानमंत्री बन गए तो उनसे पद की गरिमा के अनुरूप आचरण की अपेक्षा की जाती है। एक बार प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति चुने जाने के बाद तो दलगत राजनीति से ऊपर उठना ही चाहिए। प्रधानमंत्री का बार-बार विधानसभा चुनाव में प्रचार करना, अपने विरोधियों पर नए-नए वार करना शोभा नहीं देता। प्रधानमंंत्री राष्ट्रपति के बाद देश का सर्वोच्च पद है। जब प्रधानमंत्री खुद अपने मुल्क के नागरिक को विरोधी समझेंगे और उस पर वार करेंगे तो वह बेचारा किससे फरियाद करेगा? प्रधानमंत्री के नाते अपने विरोधी की सुरक्षा और संरक्षण की जिम्मेदारी भी उनकी ही है।

मोदीजी का अपने देश के नागरिक को नक्सली की संज्ञा देना अच्छा उदाहरण नहीं है। जिस दिन से प्रधानमंत्री ने यह कहा है उसके बाद भाजपा का हर छोटा-बड़ा नेता उसी भाषा में बात कर रहा है। अच्छा हो कि अब मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री बनने के बजाय देश का प्रधानमंत्री बनने की सोचें। इसके बावजूद यदि मोदी गली-गली जाने की इच्छा रखते हैं तो उनकी मर्जी!

इस तरह हर छोटे-बड़े चुनाव में उतरने की तो एक ही वजह हो सकती है कि किसी तरह लोकप्रियता की आड़ में राज्यसभा में बहुमत पाया जाए और फिर मनमर्जी से सरकार चलाई जाए! अब यह दिल्ली के प्रबुद्ध मतदाता को सोचना है कि उसे किसे चुनना है!

यतेंद्र चौधरी, नई दिल्ली

 

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