ताज़ा खबर
 

एक ही रास्ता

तरुण विजय शब्द-सूरमा नहीं हैं। यह धारणा तब तो और पुख्ता होती है जब आप किशोरावस्था से उन्हें पढ़ते हुए बड़े हुए हों। लेकिन आज वे बदल गए हैं। जैसे कलम की धार पर राजनीति का मुलम्मा चढ़ गया हो! उनसे जबरिया लिखवाया जा रहा हो! ‘भरोसा सरहद पार’ (दक्षिणावर्त, 12 अप्रैल) में वे लिखते […]
Author April 22, 2015 13:53 pm

तरुण विजय शब्द-सूरमा नहीं हैं। यह धारणा तब तो और पुख्ता होती है जब आप किशोरावस्था से उन्हें पढ़ते हुए बड़े हुए हों। लेकिन आज वे बदल गए हैं। जैसे कलम की धार पर राजनीति का मुलम्मा चढ़ गया हो! उनसे जबरिया लिखवाया जा रहा हो! ‘भरोसा सरहद पार’ (दक्षिणावर्त, 12 अप्रैल) में वे लिखते हैं- ‘‘सारे संदेह, सारे अपशकुन, सारे अविश्वास केवल और केवल हम अपने उन भारतीयों के लिए क्यों सुरक्षित रखते हैं, जो कर्तृत्व और व्यक्तित्व में कुछ भिन्न होंगे, पर काम तो देश के लिए कर रहे होते हैं। यह देश क्या अपने ठहराव और नदी के तालाब बनते जाते हुई काई जमने की विडंबना से तंग नहीं आ गया? कुछ तो ऐसा हो कि जड़ता टूटे। जब जड़ता टूटती है, तो जरूरी क्यों होना चाहिए कि हमारे अपने राग, छंद, गीत और मुहावरों से ही इसका उच्चाटन हो? कोई अलग भाषा, भाव और भंगिमा से भी कुछ ऐसा हो सकना संभव है, जो गांव, गरीब की हालत को तनिक सुधार दे। क्या वह भी सहन नहीं?’’

तरुण विजयजी, यदि आप फुरसत के थोड़े क्षण निकाल सकें तो 21 मार्च, 1998 के ‘राष्ट्रीय सहारा’ में लिखे अपने उन विचारों को दुहराएं जिन्हें सीने से लगाए हुए हम अकादमिक संस्थानों में उच्चतम योग्यता रखने के बावजूद गंवार, बेकार, अकुशल, अज्ञानी, असभ्य आदि उपाधियों से नवाजे जा रहे हैं। हमारी भाषा और उसमें अनुस्यूत चिंतन-प्रणाली से खार खाए लोग हमें लगभग बेइज्जत करते हुए ‘गेट आउट’ कह रहे हैं। जबकि आज भी हम अपने बच्चों को ‘आर्यावर्त विद्यालय’ में पढ़ा रहे हैं जहां गीत गाए जाते हैं-‘इतनी शक्ति हमें देना दाता….’।

यह हमारे भाषा की चाशनी में पगे होने का प्रमाण है जिस पर इस भूमंडलीकृत विश्व का दबाव उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है और पूंजी-बाजार आॅक्टोपस की तरह हमारे जल-जंगल-जमीन को लील जाने पर आमादा दिखाई दे रहा है। भाषा के मसले पर अंगरेजी से दुश्मनी नहीं है लेकिन सिर्फ अंगरेजी में ज्ञान की अभिव्यक्ति को स्तरीय और उच्चतम गुणवत्तायुक्त क्योंकर माना जाने लगा है? क्यों हमारा बच्चा विद्यालय को ‘स्कूल’ कहे और गाय को ‘काउ’? उसका जानना बुरा नहीं है। लेकिन एक ही शब्दार्थ से परिचय पर जोर, धौंस और प्रताड़ना बेहद गलत, बेहूदगी है और अपनी भाषा को बाजार में खड़ा कर उसका चीरहरण करना है। हम इनकार करते हैं, तो आज मेरे समक्ष अपनी ही पहचान को साबित करने का धर्मसंकट आ खड़ा हुआ है।

तरुणजी, आपने जो डेढ़ दशक पहले लिखा था वह गहरे भीतर को स्पर्श करने वाला था। आप कहते हैं- ‘भारत’ नाम उच्चार करते ही हजारों वर्षों की सभ्यता और संस्कृति उसमें प्रतिध्वनित होती है। यह हमारी भारत माता है और हम इसकी संतान हैं। यही वह भाव है जिसने सैकड़ों वर्षों से यहां के जन-जन को किसी एक केंद्रीय राजकीय सत्ता के अंतर्गत न होते हुए भी विदेशी हमलावरों को पहचानने और उनके विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा दी। भारत की अस्मिता और संस्कारों का ही यह प्रताप रहा कि राजस्थान की ललनाओं ने जौहर में कूदना श्रेयस्कर समझा, परन्तु विदेशी हमलावरों का स्पर्श भी पाप माना। भारतीयता की यह पुकार बनी कि जिसने आनंद कुमार स्वामी को जन्म से तरुणावस्था तक ब्रिटेन में रहने और वहीं के रंग-ढंग में पलने के बावजूद भारत लौटते ही विश्व में भारतीय कला, संस्कृति और सभ्यता के अपूर्व….’’

अब आगे नहीं लिखा जा रहा। माफ करना तरुणजी, लेकिन आज आपने एक ऐसे विश्वसनीय शिष्य को खो दिया जिसे आपने अपने विचार से सींचा था, भावों से संस्कार भरे थे, शाब्दिक प्रतीकों से एक बौद्धिक प्रतिपक्ष तैयार किया था। मुझे नहीं पता था कि वह महान विचार-पुरुष ‘मेक इन इंडिया’ का उद्गाता हो जाएगा। मेरे पिता ने कहा था-‘आपका कंप्यूटर साइंस छोड़ना एक दिन सबसे अधिक कष्ट देगा। क्योंकि आप नहीं समझ रहे हैं कि आगामी दुनिया उसी-सब की है।’ शायद उन्हें पता था कि बौद्धिक वर्ग, खासकर भारतीय बौद्धिक वर्ग कभी भी अपनी विचारधारा से पलटी मार सकते हैं। मेरे उदारमना पिता एक सरकारी विभाग में बड़ा बाबू के सामान्य पद पर कार्यरत हैं। लेकिन अनुभवी। अगले साल रिटायर होंगे। देखा जाए, तो इस घड़ी मेरे लिए ‘मेक इन इंडिया’ में जाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है….!
राजीव रंजन प्रसाद, बीएचयू, वाराणसी

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- http://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- http://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.