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ढोल की पोल

यह सर्वविदित है कि जब कोई पार्टी सत्ता में होती है तो उसके मापदंड अलग होते हैं और जब विपक्ष में होती है तो अलग। नियंत्रक और महा लेखा परीक्षक यानी ‘कैग’ ने जब यूपीए सरकार की अनियमितताओं को उजागर किया तो कांग्रेसी कैग को पानी पी-पी कर कोसते और भाजपाई अपने को स्वच्छ और […]
Author April 9, 2015 13:46 pm

यह सर्वविदित है कि जब कोई पार्टी सत्ता में होती है तो उसके मापदंड अलग होते हैं और जब विपक्ष में होती है तो अलग। नियंत्रक और महा लेखा परीक्षक यानी ‘कैग’ ने जब यूपीए सरकार की अनियमितताओं को उजागर किया तो कांग्रेसी कैग को पानी पी-पी कर कोसते और भाजपाई अपने को स्वच्छ और शुद्ध दिखाने की होड़ में लगे रहते थे। पर अब जब कैग ने भाजपा शासित प्रदेशों की कलई खोली तो वही कैग उसे दुश्मन दिखाई देने लगा। बल्कि अरुण जेटली ने बाकायदा कैग को चेतावनी तक दे डाली कि सरकारी संस्थाओं को अपनी जद में रहना चाहिए और उन्हें अपने को विशेष रूप से दिखाने से परहेज करना चाहिए। पर कैग को साधुवाद से नवाजा जाना चाहिए कि उसने तमाम बाधाओं के बावजूद अपना कर्तव्य निभाने में न तो कभी सिद्धांतों से समझौता किया और न अपने परीक्षण को किसी भी प्रकार से प्रभावित होने दिया।

चंद दिन पहले कैग ने छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बरती जा रही अमानवीय व्यवस्था को उजागर किया था जिसमें बताया गया था कि किस तरह गरीबों को सड़ा हुआ राशन खिला कर रमन सिंह वाहवाही लूट रहे हैं। अब कैग ने गुजरात के विषय में खुलासा किया है। उस गुजरात के विषय में जिसका ढोल देश ही नहीं विदेशों तक में बजाया गया है और जिसे सीढ़ी बनाकर नरेंद्र मोदी दिल्ली की सत्ता तक पहुंचे हैं। हालांकि इससे पहले भी कैग ने गुजरात मॉडल की असलियत का कई बार बखान किया है पर इस बार हकीकत कुछ अलग ही है।

पिछले दिनों गुजरात विधानसभा में पेश की गई पांच रपटों से स्पष्ट दिखलाई पड़ता है कि मोदीजी के गुजरात मॉडल में झोल ही झोल हैं। कृषि से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, लिंगानुपात, वित्तीय अनुशासन तक लगभग सभी मोर्चों पर कैग ने मोदीजी के गुजरात की खामियां ही खामियां गिनाई हैं। भाजपाइयों के अनुसार गुजरात प्रदेश अधिक राजस्व संग्रह करने वाला राज्य होने का दम भरता है पर कैग ने अपनी पड़ताल में पाया कि ये दावे न केवल अतिरंजित हैं बल्कि वे मात्र जुमले सिद्ध हुए हैं। यही नहीं, कैग रिपोर्ट के मुताबिक 2009-10 में गुजरात का राजकोषीय घाटा 15,153 करोड़ का था जो 2013-14 में बढ़कर 18,422 करोड़ का हो गया है ! राज्य के 72 सार्वजनिक उपक्रमों में से बीस घाटे में चल रहे हैं।

सामाजिक क्षेत्र की स्थिति और भी दयनीय है। गुजरात में गरीब का हर तीसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में बालकों की तुलना में बालिकाओं की संख्या में अपेक्षित कमी आई है। एक तरफ मोदीजी ‘बेटी बचाओ’ का नारा देते हैं और अपनी हर सभा में इसका ढिंढोरा पीटते हैं। दूसरी ओर कैग के अनुसार खुद उनके गृह राज्य में सरकार की ओर से भ्रूण और कन्या हत्या पर कोई कारगर कदम नहीं उठाए हैं। राज्य में पिछले वर्षों की तुलना में बलात्कार की घटनाओं में भी 76 फीसद बढ़ोतरी हुई है। गुजरात के चौंसठ प्रतिशत सरकारी स्कूलों में, जहां पांच हजार से ज्यादा बच्चे हैं, वहां एक भी शिक्षक नहीं है। पांच आदिवासी जिलों में आदिवासी कल्याण के लिए आबंटित धनराशि का काफी बड़ा हिस्सा दूसरी मदों में लगा दिया गया है। इन जिलों के बहुत सारे स्कूलों में न तो शिक्षक हैं और न ही भवन समेत बुनियादी सुविधाएं।

केंद्रीय बजट में भी बच्चों और गरीबों की बहुत बड़ी राशि सरमायेदारों और साहूकारों के हितों में लगा दी गई है। ये सारी कमियां केवल दस महीनों की देन नहीं हैं बल्कि ये मुख्यमंत्री के तौर पर मोदीजी के कार्यकाल की तस्वीर भी पेश करती हैं। जिन सामाजिक लक्ष्यों की कसौटी पर सुशासन को परखा जाना चाहिए वहां गुजरात की तस्वीर मायूस करने वाली ही है।
यतेंद्र चौधरी, वसंत कुंज, नई दिल्ली

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